
सुरेश परिहार, पुणे
कलाई करना और कलाई खोलना दो अलग-अलग कला हैं. पत्रकारिता में आने के बाद मुझे इस बात की समझ हुई. लेकिन पहले, मेरी नजर केवल कलाई करने वाले पर ही रहती थी.
आजकल कलाई करने वाले लगभग लुप्त हो चुके हैं. घरों में स्टील के बर्तन ने अपना दबदबा जमा लिया है और पीतल के बर्तन अब सिर्फ एंटीक पीस बनकर रह गए हैं. लेकिन साल 1980 के आसपास हमारे गांव में, पीतल के बर्तनपरात, भांडी, डेकची, तपेली, कड़ची, गिलास, लोटा हर घर में इस्तेमाल होते थे. और इन बर्तनों का सबसे ज़्यादा ख्यालकलाई करनातपेली और डेकची पर रखा जाता था. ऐसा माना जाता था कि इन बर्तनों में खट्टे पदार्थ रखने से भी वे खराब नहीं होते थे.
गोगापुर मेला करीब आने पर कलाई वाले महिदपुर रोड में अपने ठिकाने बना लेते थे. और मेरा उनसे सीधा संबंध इसलिए था कि हमारे घर में लकड़ी का चूल्हा जलता था. हमारे पीछे, गणेशीलालजी धमोनिया के मकान में हम किराए से रहते थे. बाबूजी खाना बनाने के बाद अक्सर बाई को कोयले बुझाने के लिए कहते थेकभी स्कूल के लिए कपड़े प्रेस करने के लिए, तो कभी मक्का भुट्टे सेंकने के लिए.
कलाई करने वाले चाचा पति-पत्नी की जोड़ी अपना सामान पहले हिम्मत सेठ के घर के सामने लगाते थे. उनकी गठरेीं देख कर लगता था जैसे कोई मदारी खेल दिखाने आया हो. जब तक उनका सेटअप तैयार नहीं होता, हमें लगता था कि यह भी किसी प्रकार का मनोरंजन है.
चाचा का सेटअप तैयार करने का तरीका भी दिलचस्प था. पहले आसपास झाड़ू लगाई जाती और मिट्टी से भट्टी बनाई जाती. एक हाथ से घुमाने वाला पंखा फिट किया जाता, जिसे चाची हाथ से घुमाती रहती. आंच को बरकरार रखना उनका काम होता. फिर चाचा बर्तन को धोते, कभी-कभी कुछ केमिकल या कास्टिक सोड़ा डालते और तुरंत सुखा देते. उल्टा करके भट्टी में रखते और उसमें आग लगाते.
जब बर्तन पूरी तरह गर्म हो जाता, तो चाचा उस पर सफेद पाउडर डालते और सूती कपड़े से रगड़ते. कभी-कभी किसी धातु की छड़ का इस्तेमाल भी होता, जो गर्म बर्तन पर डालते ही पिघल जाती. एक हाथ से बर्तन पकड़ते और दूसरे से उसे रगड़कर घुमाते. धुआं चारों ओर फैलता, अजीब सी गंध आती, और फिर बर्तन पानी में डुबोकर ठंडा किया जाता. तेज आवाज के साथबर्तन तैयार.
यह सिलसिला उस समय चलता रहा जब तक स्टील के बर्तन घरों में पूरी तरह से आम नहीं हो गए. फिर धीरे-धीरे कलाई करने वाले लुप्त हो गए. वही समय था जब मैंने कलाई खोलने पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा.

बहुत सुंदर हमने भी यह देखा है हमें वह जादू से कम नहीं लगता था देखते ही देखते बर्तन चमक जाते थे
मैं भी देखा है, पर कुछ धुंधली सी यादें हैं ।
यादों की याद दिलाते आपके लेख।
मैंने भी देखा है कलाई वाला,पीतल के बर्तन पर करते हुए,सब भूली बिसरी हुई यादें ताजा हो गई है