
पूनम शर्मा स्नेहिल, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर
रास आई न तन्हा है ये ज़िंदगी।
लाख कर लो यहांँ तुम भरे बंदगी।।
एक साथी जो देता है दिल को सुकूं।
आज लगती खुशी मुझको गजंदगी।।
जा रही है नजर दूर तक यह जहांँ।
कोई अनजान भी न है दिखता यहांँ।।
डस रही मुझको तन्हाई चारों पहर।
डाल पर तब ही पंछी दिखे हैं वहांँ।।
हाल ए दिल कर बयां मुस्कुराती है वो।
पास रहती है तो गुनगुनाती है वो।।
साथ पा कर हमें उसका ऐसा लगा।
गम को सुन धडकने भूल जाती है वो।।
ये सुकूं न मिले चार दीवार में।
घूम लो तू भले सारे संसार में।।
है दुआ रब से इतनी ही मेरी यहांँ।
एक साथी मिले सबको उपहार में।।
है जगे आस जीवन में कोई तभी।
बात सुनकर तेरी मुस्कुराए कभी।।
एक साथी बिना जिंदगी है ये क्या।
देख पंछी को समझा ये हमने अभी।।

बहुत बढ़िया
एक निवेदन
रचनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, यह अवश्य हमारे साथियों का उत्साहवर्धन करेगी और नवसृजन के लिए प्रेरित करेगी. बस एक छोटा सा निवेदन है आप सभी से कि आप अपने शहर का भी उल्लेख कर देंगे तो हमें और हमारे साथियों को लगेगा की उनकी रचनाएं कहां-कहां तक पढ़ी जा रही है.
आपका साथी
जय हो
एक निवेदन
रचनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, यह अवश्य हमारे साथियों का उत्साहवर्धन करेगी और नवसृजन के लिए प्रेरित करेगी. बस एक छोटा सा निवेदन है आप सभी से कि आप अपने शहर का भी उल्लेख कर देंगे तो हमें और हमारे साथियों को लगेगा की उनकी रचनाएं कहां-कहां तक पढ़ी जा रही है.
आपका साथी