
अरुणा रावत, अरू नई दिल्ली
ये जो मुएँ चश्मे लगा लेती हो न इन गहरी आँखों पर,
कम्बख़्त बड़े रक़ीब लगते हैं, सीधी बात, समझो ज़रा असर!
ये आ जाते हैं दर्मियाँ, मेरी-तुम्हारी नज़रों की गुफ़्तगू में,
दुश्मन से कम नहीं लगते ये, मेरी मोहब्बत की रफ़्तार रू-ब-रू में!
चाहता हूँ इन काजलभरी आँखों में, ख़ुद को उतरता हुआ देखना,
अपने प्यार के अक्स में डूबकर, स्वयं पर ही रश्क़ सा करना।
पर ये नामुराद काँच की दीवारें, दर्पण में मुझे धुँधला कर देती हैं,
तेरी आँखों की दुनिया में, मेरा चेहरा कहीं धुंध में खो देती हैं।
पर… इनमें लगती हो ग़ज़ब की क़सम ख़ुदा की!
नज़र-ए-बद से बचाए रखें, दुनिया के चेहरे साफ़ दिखाएँ सबकी।
ये रहें सलामत सदा ये चश्मे तेरे!
क्योंकि इनमें ही तो बेफ़िक्री से रख लेते हो मुझे, दिल के भीतर तेरे।

Bahut hi badhiya, mazedar , romantic