कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं

खिड़की के पास अकेली बैठी एक भारतीय महिला, चेहरे पर गहरी उदासी और आंखों में छलकता दर्द. कमरे में हल्की रोशनी और पृष्ठभूमि में धुंधली होती एक पुरुष आकृति, जो दूरी और रिश्ते के टूटने का प्रतीक है. दृश्य भावनात्मक पीड़ा, विश्वासघात और मानसिक अकेलेपन को यथार्थ रूप में दर्शाता है.

डॉ. संजुला सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

कुछ पुरुष हमारे समाज में ऐसे भी होते हैं, जो सामने से चलकर स्वयं किसी से रिश्ता बनाते हैं, किसी का हाथ थामते हैं और उम्र भर साथ निभाने के अटूट वादे कर डालते हैं, मगर जिस जल्दबाजी में वे रिश्ता बनाने के लिए किसी का हाथ थामते हैं, उतनी ही जल्दबाजी वे रिश्ता तोड़ने और हाथ छोड़ने में भी कर देते हैं।

वे रिश्तों को इतनी सहजता और इतनी चतुराई से तोड़ते हैं कि सामने वाला समझ ही नहीं पाता कि आखिर बात क्या हुई। किस वजह से रिश्ता तोड़ा गया। आखिर क्यों हजारों किए गए वादों को एक पल में भुला दिया गया। क्यों इतनी आसानी और निःसंकोच होकर हाथ छोड़ दिया गया। आखिर क्यों। और इस “क्यों” का उत्तर जीवन पर्यंत भी नहीं मिल पाता। क्योंकि अक्सर देखा गया है कि कुछ पुरुष रिश्ते तोड़ने के लिए न तो कोई बड़ा कलह करते हैं, न ज्यादा लड़ाई और न ही अधिक बहस। वे तो बस बहाने बनाकर एक ऐसी चुप्पी ओढ़ लेते हैं कि स्त्री स्वयं ही परेशान होकर, अकुलाकर, हतोत्साहित होकर, बिना कुछ बोले, बिना कुछ पूछे, बिना किसी तर्क-वितर्क के, हमेशा-हमेशा के लिए उनके जीवन से विदा होने को विवश हो जाती है।

क्योंकि स्त्री के लाख प्रयासों के बावजूद भी पुरुष कोई स्पष्ट जवाब नहीं देता। आखिर वह जवाब दे भी तो क्या दे। क्योंकि उसकी आत्मा तो जानती ही है कि वह स्वयं गलत है। वह जानबूझकर अपनी चुप्पी से सामने वाले को परेशान कर रहा है, ताकि वह स्त्री स्वयं उसकी जिंदगी से चली जाए।

कितनी विडंबना की बात है न, कि जिस स्त्री का साथ पाने के लिए, जिसका हाथ थामने के लिए पुरुष न जाने क्या-क्या जतन करता है, उसी स्त्री का हाथ और साथ वह पल भर में छोड़ देता है। ऐसा करते हुए पुरुष को न तो कोई अफसोस होता है और न ही कोई लज्जा। उसकी रूह, उसकी आत्मा उसे धिक्कारती रहती है, मगर वह उसकी भी नहीं सुनता, क्योंकि वह अपने मन में यह ठान चुका होता है कि अब उसे उस रिश्ते में नहीं रहना है।

अक्सर उसे कहीं और की हवा लग चुकी होती है, जो उसे अपनी ओर आकर्षित करती है। और फिर वह पुरुष एक को छोड़कर दूसरा, दूसरे को छोड़कर तीसरा, और तीसरे को छोड़कर चौथा, इसी तरह का क्रम अपने जीवन में चलाता रहता है। कुछ पुरुषों के लिए यह एक गंदी आदत बन जाती है। उनकी नजर में रिश्तों की कोई कीमत नहीं होती। उनके लिए रिश्ते बनाना मानो कपड़े बदलने जैसा होता है, जब मन किया जैसा चाहा पहन लिया। जैसे नए कपड़े मिलते ही पुराने कपड़ों की कोई कीमत नहीं रह जाती, ठीक उसी तरह उनकी नजर में रिश्तों की भी कोई कीमत नहीं रहती। वे रिश्तों को भी कपड़ों की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं और कुछ पुरुष ऐसा करते भी हैं।

अब सवाल उठता है उस स्त्री का, जिसने एक पुरुष पर अंधा विश्वास किया। जिसने उस पुरुष को अपने जीवन का अहम हिस्सा मान लिया। जिसने खुशी-खुशी अपना सर्वस्व उस पर न्यौछावर कर दिया। जिस स्त्री के मन में यह कल्पना तक नहीं आई कि वही पुरुष उसे इस कदर छल सकता है, उससे यूं अचानक मुंह मोड़ सकता है, उसे बीच मझधार में लाकर डुबो सकता है। वह बेचारी स्त्री इन सभी परिस्थितियों से बिल्कुल अनजान होती है।

कभी-कभी तो स्त्री उस पुरुष को ईश्वर तक का दर्जा दे देती है। वह उसे केवल प्रेम ही नहीं करती, बल्कि ईश्वर समान पूजने लगती है। पर अफसोस, जब एक दिन उसे यह सच्चाई पता चलती है कि जिसे वह आज तक ईश्वर मानती रही, जिसे हृदय से पूजती रही, वह तो इंसान कहलाने के योग्य भी नहीं था। वह कभी उसका था ही नहीं, जिसे वह अपने अस्तित्व का हिस्सा मान बैठी थी। जिसके चेहरे पर वह थोड़ी सी भी उदासी नहीं देख पाती थी।
जिस पुरुष को वह हवा के हर झोंके से बचाकर रखना चाहती थी और रख भी रही थी, वही पुरुष उसकी खुशहाल जिंदगी में अपना बनकर जहर घोल रहा था। वह मीठे शहद की तरह बोल-बोलकर उसे विष पिला रहा था। छाया देने के नाम पर उसे तपती धूप में जला रहा था। वही पुरुष उसके खिलाफ साजिशें रच रहा था। वही उसकी छोटी-सी कामयाबी से जल-भुन रहा था। साथ रहकर भी वही उसे नाग की तरह डंस रहा था।

और एक दिन जब यह सारी सच्चाइयां उस स्त्री के सामने उजागर होती हैं, तब सोचिए उस मासूम स्त्री की दशा क्या होती होगी। आखिर वह स्त्री इस गंदे छलावे से कैसे बाहर आएगी। फिर से वह सामान्य जीवन कैसे जी पाएगी। ऐसे अनगिनत सवाल हैं, जिन्हें चंद कागजों पर लिख पाना किसी के वश की बात नहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *