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फैक्ट्री गेट पर खड़ा थका हुआ गार्ड, झुकी कमर और उदास चेहरा

बंद दरवाज़ा

“बंद दरवाज़ा” एक मेहनतकश इंसान की कहानी है, जो रोज़ी-रोटी के संघर्ष में अपने सपनों को दबा देता है, लेकिन फिर भी उम्मीद के जुगनू उसकी आँखों में टिमटिमाते रहते हैं।

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बाढ़ से डूबता गांव और हाथ में किताब लिए खड़ी उदास बच्ची

“झूठा गांव”

“झूठा गांव” एक भावनात्मक कहानी है जिसमें किताबों के सुंदर गांव और बाढ़ से जूझते वास्तविक गांव का अंतर दिखाया गया है। गंगा की भीषण कटान के बीच एक बच्ची के टूटते सपनों की मार्मिक प्रस्तुति पाठकों को भीतर तक झकझोर देती है।

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श्मशान से लौटती साँसें…

श्मशान की राख से लौटकर जब ज़िंदगी की जिम्मेदारियाँ बाँहों में भर ली जाती हैं—तब यह कविता मृत्यु से आँख मिलाकर जीवन को चुनने का साहस बन जाती है।

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ग्रामीण स्त्री, श्रम और विस्थापन के प्रतीकों के साथ सामाजिक यथार्थ दर्शाती हिंदी कविता का दृश्य

वसंत नहीं लौटता

यह कविता बसंता और वसंत के प्रतीक के माध्यम से श्रम, विस्थापन और जीवन के असंतुलन को दर्शाती है। सौंदर्य, पर्यटन और संघर्ष के बीच का कटु यथार्थ इसमें मुखर है।

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खिड़की के पास अकेली बैठी एक भारतीय महिला, चेहरे पर गहरी उदासी और आंखों में छलकता दर्द. कमरे में हल्की रोशनी और पृष्ठभूमि में धुंधली होती एक पुरुष आकृति, जो दूरी और रिश्ते के टूटने का प्रतीक है. दृश्य भावनात्मक पीड़ा, विश्वासघात और मानसिक अकेलेपन को यथार्थ रूप में दर्शाता है.

कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं

कुछ पुरुष रिश्ते बड़ी आसानी से बनाते हैं और उतनी ही सहजता से तोड़ भी देते हैं. बिना किसी स्पष्टीकरण, बिना किसी टकराव के वे चुप्पी को हथियार बनाकर स्त्री को खुद ही रिश्ते से बाहर निकलने को विवश कर देते हैं. यह लेख उसी मौन छल, टूटते विश्वास और उस स्त्री की मानसिक पीड़ा की कहानी है, जो प्रेम को ईश्वर मान बैठती है और अंत में स्वयं को ठगा हुआ पाती है.

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चुप्पी में दर्ज एक स्त्री

स्त्री के उस अनकहे इतिहास की साक्षी है, जिसे वह नीले निशानों, झुकी आँखों और मौन सहमति के बीच ढोती रहती है। पिता से पति तक, देह से धर्म तक, वह हर भूमिका निभाती हुई अपनी इच्छाओं को अवर्जित कर देती है। अहिल्या, द्रौपदी, उर्मिला और सीता की तरह वह सदियों से अग्नि-परीक्षाओं में झोंकी जाती है फिर भी सृजन करती है, सहती है और अंत तक एक अभेद रहस्य बनी रहती है

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फ़र्क

एक पल में तान्या का भरोसा टूट गया और माँ दुर्गा जाग उठीं। जिस चेहरे को उसने पिता का रूप मान लिया था, वही चेहरा बच्चों की सुरक्षा पर सवाल बन गया। उस दिन उसे समझ आया—रिश्ता होना और रिश्ता दिखना, दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है।

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ज़िंदगी

ज़िंदगी मिली तो है, लेकिन ठंड, बेबसी और हालातों की मार ने उसे जीने का संघर्ष बना दिया है. वादों और प्रलोभनों में इस्तेमाल होकर, ज़िंदगी अक्सर फुटपाथों और अंधेरों में भुला दी जाती है.

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स्त्री का मौन बोझ

किसी एक स्त्री ने कभी अपने ऊपर सारी ज़िम्मेदारियाँ लाद ली होंगी प्रेम और सम्मान की आशा में। तभी तो पीढ़ियाँ गुज़र गईं, पर “ना” कहने की हिम्मत आज भी उसके भीतर कहीं दबी रह गई। उसने जो बोझ उठाया, वही बोझ उसने अपनी बेटी को भी सौंप दिया.यह कहकर कि “मैंने किया है, तुम भी करना।”
शायद अगर कभी उसने एक बार कह दिया होत “यह सिर्फ मेरा काम नहीं है, हम मिलकर बाँटेंगे”तो आज घरों में ज़िम्मेदारियाँ बराबर होतीं, और स्त्री सिर्फ कर्तव्य नहीं, अपना अधिकार भी जी रही होती।

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