वसंत नहीं लौटता

ग्रामीण स्त्री, श्रम और विस्थापन के प्रतीकों के साथ सामाजिक यथार्थ दर्शाती हिंदी कविता का दृश्य

डॉ. आशासिंह सिकरवार, प्रसिद्ध लेखिका, अहमदाबाद

बसंता रोज़ तालाब में गागर डुबोती है
अधजल से भरी गागरिन।

उठाती है एक गीत,
तब जंगल में
कूकती है कोयल,
धरती पर टपकता है महुआ,
अपनी आज़ादी में तनकर खड़ा हो जाता है सेमल,
हज़ारों फूल खिलखिलाकर हँसते हैं,
पर्यटक लौटने को होते हैं।

बसंता कई-कई दिनों तक
उदास रहती है।
चूल्हा फूँकती हुई माँ-बाबा को
सांत्वना देती है
कुछ दिन और,
गुज़ारे हुए दिनों में
ढँक जाएगी शीत-लहर।

जबकि कहीं दूर, शहर में
वसंत सड़क खोदता है,
गड्ढों से मिट्टी ढोते हुए
श्रम की बूँदों से सींचता
फूलों की क्यारियाँ।

बस में चढ़ जाता है
अनंत यात्राएँ;
पार करता है पर्वत, नदियाँ,
बियाबान;
उतरता है शहर-दर-शहर
रोटी की तलाश में।

बसंता जानती है
पर्यटकों के आने से स्थितियाँ नहीं बदलतीं,
उसके गाने से बदल जाता है
उसका पूरा वजूद।

पर्यटक आने लगते हैं,
फिर कंठ से फूट पड़ती है टीस।
पर्यटक रुक जाते हैं क्षण भर,
बसंता गाती है आदिम गीत
भीतर झरने गिरते हैं,
वसंत नहीं लौटता।

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