‘विलुप्त श्रोता’
‘विलुप्त श्रोता’ एक मार्मिक मुक्तछंद कविता है, जो मनुष्य के भीतर जमा होते दर्द, भावनात्मक थकान और ऐसे समय की विडंबना को उजागर करती है जहाँ सुनने वाले लोग धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं।

‘विलुप्त श्रोता’ एक मार्मिक मुक्तछंद कविता है, जो मनुष्य के भीतर जमा होते दर्द, भावनात्मक थकान और ऐसे समय की विडंबना को उजागर करती है जहाँ सुनने वाले लोग धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं।
“नया मन” केवल एक कविता नहीं, बल्कि जड़ हो चुके विचारों, पूर्वाग्रहों और दूषित सामाजिक यथार्थ के विरुद्ध एक संवेदनशील पुकार है। यह रचना ऐसे नए मन, नए विचार और नई चेतना की कल्पना करती है, जो निष्कलुष, मानवीय और सत्यनिष्ठ हो। कविता पाठक को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है और एक बेहतर समाज की संभावना को स्वर देती है।
प्राण प्रतिष्ठा” एक गहन प्रतीकात्मक कविता है, जिसमें देह, आत्मा, यथार्थ और तन्हाई के बीच संघर्ष को सशक्त बिंबों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। यह रचना मनुष्य के अस्तित्व, आत्मबोध और भीतर सुलगती मौन पीड़ा की मार्मिक पड़ताल करती है।
स्मृति और… तुम!’ प्रेम और अनुपस्थिति के सूक्ष्म भावों को गहरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती कविता है। स्मृतियों की नमी, इंतज़ार की सीलन और भीगे सन्नाटे के बीच यह रचना बताती है कि प्रेम को अंत तक ढोने के लिए शब्द नहीं, स्मृति चाहिए।
जब संवाद थम जाता है और इंतज़ार लंबा हो जाता है, तब प्रेम अपने भीतर सवालों की शक्ल लेने लगता है। यह रचना उसी असमंजस को स्वर देती है, जहाँ नज़दीकियाँ इतनी गहरी रही हैं कि दूरी का अर्थ समझ में ही नहीं आता। प्रेम में किया गया भरोसा, व्यस्तताओं के बीच पनपती बेचैनी और यह डर कि कहीं अपना व्यक्ति धीरे-धीरे दूर तो नहीं हो रहा इन्हीं भावों के बीच यह कविता पाठक को रिश्तों की सबसे कोमल और सच्ची अनुभूति से जोड़ती है।
यह कविता जीवन के उस कैनवास की कथा है, जहाँ धोखे और बनावटी रंग इतने फैल जाते हैं कि प्रेम, अपनेपन और आत्मा के रंग खो से जाते हैं, और बचती है केवल ख़ामोश उदासी।
यह कविता बसंता और वसंत के प्रतीक के माध्यम से श्रम, विस्थापन और जीवन के असंतुलन को दर्शाती है। सौंदर्य, पर्यटन और संघर्ष के बीच का कटु यथार्थ इसमें मुखर है।
यह कविता विकसित मानस, सद्भाव, मानवता और वैचारिक चेतना की सुगंध को रेखांकित करती है। संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर सत्य और परहित के मार्ग पर चलने का संदेश देती सशक्त रचना।
यह कविता शब्दों की मर्यादा, मनकही अभिव्यक्तियों और स्मृतियों के माध्यम से प्रेम, प्रतीक्षा और चेतना के भावों को कोमलता से रचती है।
मोबाइल आज ज्ञान, संचार और सुविधा का माध्यम है, लेकिन अंधाधुंध उपयोग ने रिश्तों, बचपन और मूल्यों को संकट में डाल दिया है। चन्द्रवती दीक्षित की यह कविता तकनीक और विवेक के बीच
संतुलन की ज़रूरत को गहराई से उजागर करती है।