मोबाइल की लत में डूबा समाज दर्शाती हिंदी कविता “मोबाइल की दुनिया”

मोबाइल की दुनिया

मोबाइल आज ज्ञान, संचार और सुविधा का माध्यम है, लेकिन अंधाधुंध उपयोग ने रिश्तों, बचपन और मूल्यों को संकट में डाल दिया है। चन्द्रवती दीक्षित की यह कविता तकनीक और विवेक के बीच
संतुलन की ज़रूरत को गहराई से उजागर करती है।

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धूप आती है….

सांझ ढलते ही मन बोझिल हो उठता है। लौटते परिंदों की फुर्ती और घोंसले तक पहुँचने की चाह सिखाती है कि ठिकाना ही असली सुकून है। लेकिन यह सांझ अब न गले लगाती है, न मुस्कान भरती है—बस तन चलता रहता है और मन सूखे पत्तों-सा झरता है। खाने की मेज़ पर अब बर्तनों का कोई राग नहीं, न ही निवालों की कोई चिरौरी। पेट भरना भी बस एक कवायद रह गया है। फिर भी गलियारों से आती धूप पतझड़ से मन को बसंत की ओर ताकने पर मजबूर कर देती है। आँखों से बहता नमकीन पानी चुपचाप तकिए में समा जाता है। सुबह आती है, थकी-हारी, पर वही रोज़मर्रा की भागदौड़ मन को थोड़ी राहत देती है। दिन के उजाले में नए चेहरे और कहानियाँ मिलती हैं, और धीरे-धीरे सांझ से रात तक का मलाल भी उतरने लगता है।

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