
सुरेखा अग्रवाल स्वरा, प्रसिद्ध लेखिका
अचानक यूँ ही बात चली संवाद पर।
याद आया कुछ।
“सुनो न, कुछ संवाद लिखो।”
और बहुत आसानी से चंद पंक्तियाँ तुम्हारे हवाले कर दी थीं।
तुम ज़ोर से हँस पड़े थे
“अबे, ऐसे नहीं।”
फिर कुछ पंक्तियाँ तुमने लिखीं।
मैं संवाद के मायने समझ नहीं सकी थी।
तुम कुछ भी सोचे-समझे बिना नहीं कहते थे,
पर क्या?
यह हमेशा मेरे लिए एक बड़ा प्रश्न रहा।
जब भीतर कुछ गहन होता,
या मन में कोई भूचाल चलता,
तभी तुम कुछ कह देते थे
जो कभी बेवजह नहीं होता था।
आदत जानती थी।
आज संवाद होते ही नहीं।
रिश्ते डिजिटल हो चले हैं।
वे keyboard की भाषा जानते हैं।
आँखों में आँखें डालकर जो गहराई बनती थी,
वह संवादों से अब नदारद है।
वे संवाद
जो गहरी छाप छोड़ जाते थे,
जिन्हें भूलना आसान नहीं होता था।
हर तरह के भावों वाले संवाद
सीधे ज़ेहन में उतर जाते थे।
आज संवाद के लिए तरसता मन
बहुत कुछ कहना चाहता है,
पर पाबंदियों का क्या करें?
आज एकांत में बैठ
पंखे से संवाद करती हूँ।
उसकी कभी तेज़, कभी धीमी रफ्तार
मुझसे कहती है
“सुनो, गति पर पकड़ बनाए रखो,
वरना speed kills।”
जब धड़कन बेकाबू होने लगती है,
तो वह सीधे मुझसे संवाद करती है।
स्पीडोमीटर की वह अजीब-सी आवाज़ पूछती है—
“All is well?”
चाहे वह ICU का शांत कमरा हो
या #post operative ward
एक अजीब-सा कोलाहल संवाद करता है।
पूरी धुरी मस्तिष्क के साथ involve हो जाती है।
तभी महसूस हुआ
सन्नाटा
बेहद बुलंद आवाज़ में संवाद करता है।
ज़िंदगी से बेहतरीन bonding-Bip Bip
कमरे की धीमी बत्ती भी कम नहीं।
शानदार अभिव्यक्ति के साथ
ज़िंदगी के हर उतार-चढ़ाव को
बखूबी समझाती है।
Voltage ज़रूरी है,
पर संयमित
जहाँ बढ़ा, वहाँ Boom
ज़मीन पर दर्द से कराहते पैरों को
जब नज़रअंदाज़ करती है,
तब मन खुद से एक प्रश्न पूछता है
अपने पैरों पर खड़े होने का अर्थ
आज समझ आता है।
पैरों और तालमेल के बीच
एक विचित्र संवाद
दोनों कहते हैं,
“हम एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।”
तालमेल टूटा तो-धड़ाम
मनोबल का क्या?
हौले से उठकर
शीशे की ओर देखती हूँ।
एक तेज़ अट्टहास के साथ
सिर्फ मेरी आँखों में झाँकता एक प्रश्न
“इन आँखों का क्या करोगी?”
नम उजास आँखें
तुम्हारे ज़ेहन से तालमेल बिठाने की कोशिश करती हैं,
जहाँ सारे संवाद
भावशून्य पड़े थे।
आइने से झाँकते तुम
फिर मुस्कुराते हुए पूछते हो
“अब भी लिख सकोगी
संवाद पर कुछ?”
शायद नहीं।
मौन की कोई आवाज़ नहीं होती।
मौन संवाद
कभी ज़ाहिर नहीं होते।
सुनो,
संवाद लिख पाना आसान नहीं होता
बिल्कुल आसान नहीं।
पर आज उठ खड़ी हूँ।
मेरी पायल की छम-छम
मुझसे संवाद करने को आतुर है।
शॉवर का पानी
पूरे देह पर समर्पण की चाह रखता है।
सांसों की
एक मौन जुगलबंदी
अनछुए जज़्बातों के संग।
जब ज़ुबान
आँखों का साथ नहीं देती,
तो मन
एक पुकार के साथ
सामंजस्य बिठाने की कोशिश करता है।
शायद विचारों के संवाद
#telepathy के रास्ते
पहुँच जाएँ।
बड़े रौब से कहते थे तुम
“मैं मन के संवाद
बखूबी पढ़ लेता हूँ।”
तो आज
मैं एक प्रश्न पूछती हूँ
लिख सकते हो तुम
आज संवादों पर कुछ?

मन के संवाद कौन समझ सका…
बेहतरीन ….
हमेशा बेह्तरीन