फोन पर माता-पिता से तलाक पर बहस करती महिला, भावनात्मक पारिवारिक संघर्ष का दृश्य।

बसा बसाया घर

‘बसा-बसाया घर’ एक ऐसी मार्मिक लघुकथा है, जिसमें बेटी अपने तलाक के फैसले पर अडिग रहती है। माता-पिता उसे समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन बातचीत के दौरान वह उनके अतीत का ऐसा सच सामने रख देती है, जिससे दोनों निरुत्तर हो जाते हैं। कहानी रिश्तों में विश्वास, दोहरे मापदंड और आत्मसम्मान जैसे गंभीर विषयों को उजागर करती है। यह कथा बताती है कि दूसरों को सलाह देना आसान है, लेकिन जब सच सामने आता है तो अपने ही बनाए मूल्य टूट जाते हैं।

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टूटे दिल वाली स्त्री खामोशी से अंधेरे कमरे में बैठी हुई, आंखों में दर्द और विश्वासघात का भाव

मेरा संसार

यह कविता एक ऐसे टूटे हुए मन की आवाज़ है, जिसने अपने पूरे संसार को एक ही व्यक्ति में समेट लिया था. भरोसे, प्रेम और समर्पण के बदले उसे झूठ, छल और दर्द मिला. यह रचना विश्वास के टूटने से उपजे आंतरिक संघर्ष, पीड़ा और आत्मबोध को बेहद मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त करती है

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खिड़की के पास अकेली बैठी एक भारतीय महिला, चेहरे पर गहरी उदासी और आंखों में छलकता दर्द. कमरे में हल्की रोशनी और पृष्ठभूमि में धुंधली होती एक पुरुष आकृति, जो दूरी और रिश्ते के टूटने का प्रतीक है. दृश्य भावनात्मक पीड़ा, विश्वासघात और मानसिक अकेलेपन को यथार्थ रूप में दर्शाता है.

कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं

कुछ पुरुष रिश्ते बड़ी आसानी से बनाते हैं और उतनी ही सहजता से तोड़ भी देते हैं. बिना किसी स्पष्टीकरण, बिना किसी टकराव के वे चुप्पी को हथियार बनाकर स्त्री को खुद ही रिश्ते से बाहर निकलने को विवश कर देते हैं. यह लेख उसी मौन छल, टूटते विश्वास और उस स्त्री की मानसिक पीड़ा की कहानी है, जो प्रेम को ईश्वर मान बैठती है और अंत में स्वयं को ठगा हुआ पाती है.

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अजब-गजब के रिश्ते

मैंने कई रिश्तों से गुज़रते हुए बहुत कुछ देखा है। मैंने उन लोगों को देखा जो दिल और जान से मरने वाले थे, पर उनके ही सीने में खंजर उतरते थे। जो लोग महफ़िलों में सीना चौड़ा करके सामने आते थे, उन्हें पीठ में वार करते देखा है। रात भर चादर की सिलवटों को और सुबह उसी चादर को सीधा होते भी देखा है। मैंने उन लोगों को भी देखा जो ताउम्र जख्म देते रहे, और फिर उनके कंधों पर सिर रखकर रोते थे। जिंदगी में बहारों का मौसम लेकर आने वाले लोगों को अक्सर ऐसे लोगों को विरानियों में बदलते हुए देखा है।

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आदर, मंच और धोखा

“एक दिन अचानक सरला के खाते में साढ़े तीन लाख रुपये आ जाते हैं। कोई जानकारी नहीं, कोई सूचना नहीं। थोड़ी ही देर में एक फोन आता है—‘मैं रामभरोस बोल रहा हूं, मेरी बहू से गलती से आपके खाते में पैसे आ गए हैं, लौटा दीजिए।’ सरला चौंक जाती है। क्या यह कोई साजिश है या ईमानदारी? चेक लौटाया जाता है। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकती। वह आदमी बार-बार घर आने लगता है—कभी चाय पर, कभी मोहल्ले में गाड़ी खड़ी करने के बहाने। उसके शब्दों में ‘मिशन’, ‘समाजसेवा’ और ‘फायदा’ की मीठी-मीठी बातें होती हैं।

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