आदर, मंच और धोखा

फर्ज़ी समाजसेवा की असली कहानी

एक रोज़ यूँ ही चुपचाप, जैसे कोई सपना बिना दस्तक दिए चला आए, अचानक सरला के खाते में साढ़े तीन लाख रुपये आ गए। सरला चौंक पड़ी। धन की यह अनायास वर्षा कोई आशीर्वाद थी या किसी मुसीबत की आहट?
अरे! ये कैसे संभव हुआ? आधे घंटे बाद एक फोन आता है, मैंने आपके खाते में अपनी बहू वंदना के खाते से पैसे डाले हैं। क्‍या आप घर पर हैं? मुझे तुरंत मेरा पैसा वापस कर दो। मैं रामभरोस बोल रहा हूं। सरला सोच में पड़ी रही कि इस आदमी ने ऐसा क्‍यों किया होगा? आज जहां इंसान धन के लिए अपने सगे भाई का गला काट रहा है वहां यह किसी और के खाते में पैसा क्‍यों डाल रहा है?
रामभरोस आया — साधारण वेशभूषा, पर चाल में आत्मविश्वास। वह चेक ले गया, पर उसकी भूख यहीं नहीं रुकी।
“अब मुझे आपके और साढ़े तीन लाख चाहिए,” उसने अपनी कुटिल मुस्कान में लपेटा प्रस्ताव रखा।
“क्यों दें भला?”
क्‍यों? अपना क्‍यों दें? सरला ने सकपका कर पूछा।
“कंपनी में निवेश करना है आपको पैसा बढ़ाकर मिलेगा।
पर हमारे पास कोई पैसा नहीं है।
उसकी तैयारी रामभरोस ने पहले ही से कर रखी थी। सरला के पति को उसके एलआयसी पर लोन निकलवाया था। उसी पैसे पर उसकी नजर टिकी हुई थी। तो वो कहां पीछे हटने वाला था। क्‍योंकि उसने अपने बेटे को पायलट बनाने के लिए सभी स्रोतों से लोन निकाल रखा है अब वो भरे तो कहां से? तो अन्‍य लोगों को फंसाकर उनसे पैसा लेना ही है।
सरला ने कहा, अभी मेरे पास कोई पैसा नहीं है। जो है वो मेरे बच्‍चों की पढ़ाई के लिए है। मैं नहीं दे सकती।
आज तो वो चला गया, परंतु वह सरला के घर किसी न किसी बहाने से चक्‍कर लगाता रहा। कभी उस मोहल्‍ले में अपनी गाड़ी खड़ी करने आता, तो कभी सुबह-सुबह नाश्‍ते के समय पहुंच जाता। रोज पैसा दे दो, दे दो कहता रहता, परंतु सरला मना करती रही। कहती रही मेरे बच्‍चे को डॉक्‍टर बनाना है बहुत पैसा लगने वाला है। मैं खुद रिश्‍तेदारों से पैसा मांगकर इकट्ठा कर रही हूं।
फिर एक दिन वो सरला के घर आया साथ में अपनी कंपनी का पेपर लाया और उस पर लिखकर गारंटी देने लगा। और बड़ी-बड़ी बातें करके गारंटी देने लगा। फायदा नहीं भी मिला तो तुम्‍हारा मूलधन वापस मिलेगा, उसकी गारंटी देता हूं। वो भी नहीं मिला तो हर महीने का राशन दिलवाऊंगा। मेरे ऊपर विश्‍वास नहीं है आप लोगों को, बलसाड में जगह है चालीस फ्लैट मिलेगा वो बेचकर लौटा दूंगा। मेरे मरने के बाद भी आपको पैसा मिल जायेगा दो करोड़ की एलआयसी है मेरी। और तो और कहने लगा ‘’जब हम मर जाऊंगा तो मेरा बेटा वापस करेगा।‘’
भूखे भेडि़ये की निगाह एक बार जब शिकार पर पड़ गयी तो कहा छोड़ता। तरह-तरह की गारंटी देकर पेपर पर लिखकर अपना साइन दिखाकर पैसा लेकर ही माना।
सरला से तो पैसा ले लिया पर इतने में उसे कहां संतुष्टि थी? अब उस आदमी ने सरला के पति को अपने हर मिशन पर महत्‍व देना शुरू कर दिया। कोई कार्यक्रम हो कहता समर जी आपका रहना तो बहुत ही जरूरी है, आपके बिना कोई प्रेाग्राम हो ही नहीं सकता। आइये आपको ही मुख्‍य अतिथि बनाऊंगा। लोगों के भले के लिए ही मैं दिनरात मेहनत कर रहा हूं उसमें आप विशेष हैं आपका सबसे ज्‍यादा ध्‍यान रखता हूं।
मेरा स्‍कीम हैं जिसमें पैसा डबल होता है आप और पैसा डाल दो । समर स्‍तब्‍ध रह गया, मेरे पास तो फूटी कौड़‍ी नहीं है एक फ्लैट लेकर भी मैं फंस चुका हूं वो आज तक बना नहीं बस लोन हो गया है मैं क्‍या करूं?
नहीं हैं तो क्‍या हुआ? आप को सरकारी अफसर हैं, आपको तो लोन आसानी से मिल सकता है। रामभरोस कुटिल मुस्‍कान के साथ बोला। आप अपने कई रिश्‍तेदारों का भी पैसा डलवा दो, मित्रों का भी डलवा दो। फिर देखों धनवर्षा प्रारंभ हो जायेगी। सब के सब अंबानी हो जाओगे। आखिर समर को अपने जाल में फंसा ही लिया, समर ने सात लाख लोन निकालकर रामभरोस को दे दिया। अपने मित्रों से भी दिलवाया। उस दिन अपनी कुटिल चाल में सफल रामभरोस मन ही मन खिलखिला रहा था।
एक वो दिन था और आज चार साल बाद रामभरोस छू मंतर हो चुका है। छ: महीने तक फोन उठा लिया करता था, साल भर तक झूठी दिलासा देता रहा। अभी लेट हो रहा है, अब पैसा आयेगा तुम्‍हारे खाते में, और दो महीने लेट आयेगा, फिर और तीन महीना लगेगा। ऐसा करते-करते लोगों का फोन उठाना बंद कर दिया, छू मंतर हो गया। क्‍योंकि उसने ऐसा सिर्फ सरला और समर के साथ ही नहीं किया था। सैकड़ों परिवारों में यही खेल खेला था। अब सरला और समर दुखी मन से अपनी कमाई से इंटरेस्‍ट भरते चले जा रहे हैं।
आ गया वो समय जब उनकी बच्‍ची का एमबीबीएस में एडमीशन दिलाने का सपना पूरा करने का परंतु उस सपने को तो रामभरोस नाम का जहरीला सांप डस गया था। जितने भी लोन निकालने के स्रोत थे उससे तो लोन पहले ही निकलवाकर रामभरोस ले गया। अभी कहां से भरते फीस? कैसे कराते एडमीशन? हार मान गये। बीडीएस कराने की ही क्षमता बची थी। उसमें एडमीशन करा दिया गया। इस मजबूरी का दुख सरला को हमेशा ही सताता रहता है। और वह आदमी शायद अपना घर भरकर ऐश कर रहा हो, या बहुत बड़ा समाजसेवी कहला रहा हो। लेकिन सरला और ऐसे अन्‍य परिवारों ने तो उसे समाज का नासूर घोषित कर दिया है जो आज भी आम जनता को अपने मिशन से जोड़कर, उन्‍हें मान-सम्‍मान देकर, विश्‍वास में लेकर ठगी का धंधा करता है।
इस रामभरोस नामक प्राणी से सरला और उसका पति दो साल पहले ही किसी सामाजिक कार्यक्रम में मिले थे। फुल टाइम बक-बक करने वाला आदमी अपने मिशन और अपने अधूरे ज्ञान को इस प्रकार पेश करता कि जैसे सामने वाला इंसान अज्ञानी हो। अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनना इसकी फितरत थी। ज्‍यादातर महिलाओं के आस-पास भटकना, उनका मान-सम्‍मान और उन्‍हें मंच पर बोलने का मौका देना, यह कहकर हम सावित्रीबाई फूले, और कई महापुरुषों का प्रचारक हूं, तो महिलाओं को तो प्राथमिकता देना ही है, समाज के जागरुक पुरुषों को यह समझाते-समझाते धीरे-धीरे उनके घरों में प्रवेश किया। पूरे परिवार से मित्रता की, सभी को महत्‍व दिया। अक्‍सर कहता- ‘’रोटी-बेटी का रिश्‍ता बनायेंगे चाहे शूद्र हो या बहुजन सब मेरे भाई हैं।‘’
अच्‍छा, मैं एक बिजनस शुरू कर रहा हूं। आप पांच लाख कांट्रीब्‍यूशन दो आपको भी फायदा पहुंचाऊंगा। समर बोले, नहीं हमारे पास इस समय कुछ नहीं है। मेरे दो बच्‍चे पढ़ाई कर रहे हैं। सब बच्‍चों की पढाई में लगा दिया। इस बार तो उसे यहां से कोई धन हासिल नहीं हुआ।
‘’आप भी नौकरी वाले और आपकी पत्‍नी भी ऐसे कैसे पैसा नहीं है।‘’ चिंतित स्‍वर में रामभरोस बोला।
‘’लोन तो मिल सकता है न। आप का एलआयसी है, मैं दिलवाऊंगा उस पर लोन। मुझे सारी डिटेल दे दो और लेकर चला गया।‘’ समर का उत्‍साह बढ़ाते हुये रामभरोस बोला।
नियमित रूप से जन्‍मदिन या मरणदिन या महापुरुषों की जयंती में वो समर और सरला को और इनके जैसे अन्‍य कई परिवारों को आमंत्रित करता रहा। कभी अपने घर बुलाता तो कभी उनके घर पहुंच जाता। रिश्‍ते शूद्र के नाम पर प्रगाढ़ हो रहे थे। घर, परिवार और समाज की बात करते-करते वह हमेशा पूछता कि आपके पास कितना पैसा है? और नहीं है तो कितने लोन लेने के स्रोत हैं? हमसे पैसा लेकर वह हमें किस प्रकार फायदा पहुंचायेगा, इस बात का लालच देना वह नहीं भूलता था। हमें आज इस मनोवैज्ञानिक धोखाधड़ी के खेल का एहसास हो रहा है जो उस समय होना चाहिए था कि आप के घर आकर कोई बेझिझक पैसों की और आपको फायदा पहुंचाने की बात करे तो उसी समय उसे कचरा समझकर अपने घर का झाडू़ उठाकर बाहर कर देना चाहिए।
बहरहाल, कई साल हो गये वो नज़र नहीं आया। हमें ही नहीं अन्‍य लोगों को भी नजर नहीं आया जिनसे उसने रुपया-पैसा ठगा है। बैरवा, देवेन्‍द्र, रमेश, गिरधारी, अमर और न जाने कितने मासूम लोगों के न जाने कितने लाख ठग कर वो कहीं दुबक कर बैठा है। इस बहेरूपिये को हमने देर से पहचाना परंतु आज भी यह नये लोगों अपने मिशन से जोड़कर मान-सम्‍मान का लालच और रूपयों की ठगी का धंधा कर रहा है।
सरला ने रामभरोस द्वारा साइन किये गये गारंटी पेपर को किसी प्रकार जब उसके बड़े बेटे तक पहुंचाया तो उसके बेटे ने कहा ये क्‍या है ये लीगल पेपर थोड़ी है यह तो नार्मल पेपर है। ठीक है रामभरोस चालू आदमी है कि वह नार्मल पेपर पर गारंटी दे देकर किसी पैसे लेकर फरार हो सकता है तो ठीक उसका पूरा परिवार उसके मिशनरी बाप की चालाकी का जश्‍न मनाता रहे। इस कलयुग में किसी पर ट्रस्‍ट नहीं करना चाहिए ये तो जगजाहिर था, फिर भी हम लोगों ने विश्‍वास कर लिया। परंतु आने वाली पीढ़ी को संदेश जरूर पहुंचे कि किसी पर भी विश्‍वास करना गलत साबित हो सकता है।

डॉ. शशिकला पटेल, प्रसिद्ध लेखिका और असिस्टेंट प्रोफेसर, मुंबई

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