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सरस्वती वन्दना

अंतरमन शुचि सुंदर हो मॉं
राग विकार रिक्त हो जाऊँ!
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रच जाऊँ श्रध्दा से माँ मैं
साँस-साँस पूजन हो जाये।
शब्द करे यूँ नर्तन मन में
मन वृंदावन हो मुस्काए।

मन वीणा के तारों से माँ
महिमा तेरी पावन गाऊं।
अंतरमन शुचि सुंदर हो मॉं
राग विकार रिक्त हो जाऊँ!
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मन ही मन की न समझे
मैं मनका-मनका फेर रही हूँ।
घट-घट रमते बनमाली सा
नन्दन वन को हेर रही हूँ।

शीश मेरे माँ हाथ तो रख दो
झूम-झूम पग से लग जाऊँ।
अंतरमन शुचि सुंदर हो मॉं
राग विकार रिक्त हो जाऊँ!
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उर भीतर एक भाव जगे
उजियारे का प्रतिमान बनूँ।
खुल जाएँ डग के अवरोधक
जीवन में गतिमान बनूँ।

विश्वासों की सघन गली में
निवी नाम का दीप जलाऊँ।
अंतरमन शुचि सुंदर हो मॉं
राग विकार रिक्त हो जाऊँ!

निवेदिता श्रीवास्तव ‘निवी’
  सुप्रसिद्ध लेखिका, लखनऊ

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