सरस्वती वन्दना

यह कविता एक साधिका की अंतरतम पुकार है, जिसमें वह माँ से प्रार्थना करती है कि उसका अंतर्मन शुद्ध, निर्मल और विकारों से रहित हो जाए। वह चाहती है कि उसका प्रत्येक श्वास एक श्रद्धा से भरा पूजन बन जाए, और उसका मन ऐसा हो जैसे मुस्काता हुआ वृंदावन। कविता में भक्ति का भाव सहज रूप से बहता है — कभी वह मन की वीणा पर माँ की महिमा का गीत गाना चाहती है, तो कभी बनमाली को खोजती हुई नंदनवन की ओर बढ़ती है।
कवयित्री अपने जीवन में अवरोधों को दूर कर विश्वास की गली में ‘निवी’ नामक दीप जलाकर गतिमान बनने की आकांक्षा रखती है। यह रचना केवल भक्ति नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और चेतना के उजास की ओर यात्रा है।

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नलखेड़ा का जागृत धाम

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी कौशल बंसल ने मां बगलामुखी मंदिर, नलखेड़ा के जीर्णोद्धार और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी आध्यात्मिक साधना, अनुभव और चमत्कारी घटनाओं से यह धाम आज एक जागृत शक्ति पीठ के रूप में प्रसिद्ध हो चुका है।

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