मुक्ति की राह : ज्ञान, कर्म और परमधाम
आत्मा परमधाम की वासी है—पवित्र, दोषरहित। स्थूल लोक में कर्मों के प्रभाव से वह अपवित्र होती है, इसलिए स्वयं परमात्मा आकर ज्ञान के माध्यम से आत्मा को फिर से पावन बनाते हैं और उसे मुक्ति की ओर ले जाते हैं।

आत्मा परमधाम की वासी है—पवित्र, दोषरहित। स्थूल लोक में कर्मों के प्रभाव से वह अपवित्र होती है, इसलिए स्वयं परमात्मा आकर ज्ञान के माध्यम से आत्मा को फिर से पावन बनाते हैं और उसे मुक्ति की ओर ले जाते हैं।
यह कविता एक साधिका की अंतरतम पुकार है, जिसमें वह माँ से प्रार्थना करती है कि उसका अंतर्मन शुद्ध, निर्मल और विकारों से रहित हो जाए। वह चाहती है कि उसका प्रत्येक श्वास एक श्रद्धा से भरा पूजन बन जाए, और उसका मन ऐसा हो जैसे मुस्काता हुआ वृंदावन। कविता में भक्ति का भाव सहज रूप से बहता है — कभी वह मन की वीणा पर माँ की महिमा का गीत गाना चाहती है, तो कभी बनमाली को खोजती हुई नंदनवन की ओर बढ़ती है।
कवयित्री अपने जीवन में अवरोधों को दूर कर विश्वास की गली में ‘निवी’ नामक दीप जलाकर गतिमान बनने की आकांक्षा रखती है। यह रचना केवल भक्ति नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और चेतना के उजास की ओर यात्रा है।