
ऊषा भदूला( बी.के)
आत्मा ही वह शक्ति है, जो हमारे शरीर को चलाती है। आत्मा शरीर में भृकुटि के बीचों-बीच स्थित होती है। पूरे शरीर की मालिक आत्मा ही है और वही हमारे संस्कारों का लेखा-जोखा रखती है।
अब प्रश्न यह है कि आत्मा कहाँ से आती है और शरीर के माटी हो जाने पर वह कहाँ जाती है? आइए, इसी पर विचार करते हैं।
आत्मा का पिता परमात्मा है, जो परमधाम में निवास करते हैं। परमधाम वह स्थान है जहाँ निराकार परमेश्वर शिव भगवान रहते हैं। उनसे नीचे है सूक्ष्मलोक, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास है। तीसरा है लौकिक धाम या स्थूल लोक, जहाँ हम मनुष्य रहते हैं अर्थात यह पृथ्वी।
अब सवाल उठता है कि आत्मा का वास्तविक निवास स्थान कहाँ है? जहाँ पिता होगा, बच्चे वहीं रहेंगे जी हाँ, आत्मा भी परमधाम की वासी है। वह नीचे उतरकर स्थूल लोक में अपना-अपना पार्ट निभाने आती है। आत्मा अपने कर्मों के अनुसार जन्म लेती है और नौ माह तक गर्भ में रहती है, जिसे नरक भी कहा जाता है, क्योंकि वहाँ उसे अत्यधिक कष्ट सहने पड़ते हैं। उस समय वह भगवान से विनती करती है कि शीघ्र ही इस नरक से बाहर निकालें और बाहर आते ही वह सत्कर्म करेगी तथा सदा उनका स्मरण करेगी। लेकिन जन्म लेते ही वह सब भूल जाती है और नया कर्मिक लेखा-जोखा बना लेती है।
अब यहाँ यह प्रश्न उठता है कि आत्मा वापस परमधाम कैसे जाती है और कब जाती है? आत्मा परमधाम से पूर्णतः पवित्र होकर आती है. उसमें कोई दोष या कमी नहीं होती, क्योंकि भगवान अपने बच्चों को अपने समान ही पावन बनाते हैं। लेकिन स्थूल लोक में आने के बाद यहाँ के प्रभाव उस पर पड़ने लगते हैं। विकारों में फँसकर वह ऊँच से नीच बन जाती है, अर्थात अपनी पवित्रता खो देती है।
ऐसे समय में भगवान को स्वयं अपने बच्चों को फिर से पावन करने आना पड़ता है, क्योंकि अब कलियुग का अंत चल रहा है और उसके अनेक संकेत हम देख ही रहे हैं। कोरोना काल में जो स्थिति बनी, वह सभी के सामने है। आज भी कहीं प्रकृति कहर ढा रही है, तो कहीं विज्ञान के दुरुपयोग से स्वयं मानव अपने विनाश का कारण बन रहा है। हाल ही में दिल्ली, कश्मीर जैसी घटनाएँ, कम उम्र के बच्चों का बहकावे में आकर हिंसा की ओर बढ़ना, विदेशों में चल रहे युद्ध ये सभी कलियुग की समाप्ति के संकेत हैं। पाप बढ़ गया है और इंसानियत बहुत कम रह गई है।
अब सबको वापस अपने घर, अर्थात परमधाम जाना है। लेकिन आत्मा अपवित्र होकर वहाँ जा नहीं सकती। इसलिए प्रत्येक को अपने कर्मों का हिसाब-किताब चुकता करना होता है। यह कार्य माया-मोह में फँसकर नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें उलझकर मनुष्य और अधिक पाप ही करता है। इसी कारण स्वयं निराकार शिव परमात्मा को तन का आधार लेकर आना पड़ता है। वे वही ज्ञान देते हैं, जो गीता में बताया गया है और यह भी सिखाते हैं कि उस ज्ञान को जीवन में कैसे धारण किया जाए।
हम गीता, रामायण जैसे ग्रंथ पढ़ते तो हैं, पर उनमें बताई गई धारणाओं को जीवन में लागू नहीं करते और स्वयं को बड़ा पंडित समझ लेते हैं। जबकि सच्चा आस्तिक या पंडित वही है, जो गीता के ज्ञान और श्रीराम के दिव्य गुणों को अपने जीवन में उतारता है।
इसी उद्देश्य से स्वयं शिव परमात्मा ब्रह्मा तन का आधार लेकर हमारी आत्माओं को पवित्र करने आते हैं और फिर उन्हें अपने साथ वापस ले जाते हैं जिसे हम मुक्ति धाम कहते हैं। वहाँ आत्माएँ सदा के लिए नहीं रुकतीं, बल्कि फिर नई दुनिया, अर्थात स्वर्ग में जन्म लेती हैं।
