
संध्या यादव, मुंबई
पंछी की तरह
पलकों पर आकर बैठा वो…
और…
चोंच मार-मार कर
मेरी नींद चुग गया…
धूप बना—
और मेरी पुतलियों की नमी को
भाप कर गया…
वो…
मेरी गर्दन पर
लंबे बालों से छिपा
एक काला तिल था…
जिसकी मौजूदगी
मेरे बदन पर हर वक्त थी—
पर…
मुझे दिखता नहीं था…
मेरी हथेलियों की रेखाओं के
टापू पर…
उसका नाम
एक द्वीप बनकर उभरा तो था…
पर वक्त की तेज धार में
ऐसे मिट गया—
कि अब…
जीवन के इतिहास में
बताने को
कोई प्रमाण भी नहीं बचा…
वो…
ठंडी पुरवाई की तरह आया…
और
गर्मियों की दुपहरी की उदासी बनकर
उम्र भर साथ रहा …
न जाने वो कहाँ…
न जाने मैं कहाँ…
पर अक्सर—
शास्त्रों में पढ़ी –सुनी एक बात
याद आ जाती है…
“शरीर मरता है…
आत्मा नहीं “
तो क्या—
मैं शरीर थी…
और वो… आत्मा?.
लेखिका के बारे में
संध्या यादव
मुंबई की माटी में जन्मी और उसी कर्मभूमि में अपने साहित्यिक व्यक्तित्व को निखारने वाली संध्या यादव समकालीन हिंदी साहित्य की एक सशक्त और संवेदनशील आवाज़ हैं। कॉलेज जीवन से ही लेखन की ओर उन्मुख हुईं संध्या जी की रचनाएँ न केवल प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, बल्कि आकाशवाणी और विभिन्न साहित्यिक मंचों के माध्यम से भी उन्होंने पाठकों और श्रोताओं के दिलों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।उनकी कविताएँ जीवन के सूक्ष्म भावों, स्त्री-अनुभवों और सामाजिक यथार्थ को गहन संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त करती हैं। “दूर होती नज़दीकियाँ”, “चिनिया के पापा” और “ओस सी लड़की” जैसे उनके काव्य संग्रह पाठकों के बीच विशेष रूप से सराहे गए हैं, जिनमें मानवीय रिश्तों की जटिलताओं और भावनाओं की कोमल परतों को खूबसूरती से उकेरा गया है। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी साहित्यिक उपस्थिति का प्रमाण है कि उन्हें दिल्ली के प्रतिष्ठित लाल किला पर आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों (2019 एवं 2024) में काव्य पाठ का अवसर प्राप्त हुआ। उनकी रचनात्मकता को अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है, जिनमें “संत नामदेव पुरस्कार 2023” विशेष रूप से उल्लेखनीय है।उनकी रचना का महाराष्ट्र के संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल होना उनके साहित्य की सार्थकता और प्रभाव का सशक्त प्रमाण है।
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धन्यवाद सर 🙏