चीखती इंसानियत

अंधेरी गली में भूखा बच्चा, पृष्ठभूमि में झगड़ा और सामने जलता हुआ दीया, जो उम्मीद का प्रतीक है.

डॉ.रुपाली गर्ग, मुंबई

चीख रही है इंसानियत, हर गली, हर मोड़ पर,

अपने ही हाथों लहूलुहान,खड़ी है दर्द के घोर पर।

कहीं भूख से तड़पते बच्चे, कहीं रिश्ते हुए लाचार,

कहीं नफरत की आंधी में, उड़ते सपनों के घर-द्वार।

क्यों इतना अंधा हो गया है,मन का उजियारा खोकर,

इंसान ही इंसान को कुचलता,अपने स्वार्थों में डूबकर।

कहाँ गया वो प्रेम पुराना,अपनापन, विश्वास,

आज हर दिल में उठता केवल, शक, भय और त्रास।

पर अभी भी एक किरण बाकी,अंधियारे के पार कहीं,

अगर जागे संवेदना फिर,तो बदलेगा संसार यहीं।

उठो, जलाओ दीप करुणा का, मन में प्रेम जगाओ,

इस चीत्कार करती दुनिया में, फिर से इंसान बन जाओ॥

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