
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल
मैं एक छोटी-सी कलम हूँ,
पर बड़े-बड़े कमाल दिखाती हूँ।
किसी के सपनों की चाबी हूँ मैं,
तो किसी की रातों की नींदें उड़ाती हूँ।
मैं एक कलम हूँ,
दिल के जज़्बात लिख जाती हूँ।
बातें जो बरसों से अंतर्मन को करती रहीं ज़ख्मी,
उस तूफ़ान को किसी तरह शांत कराती हूँ।
मैं एक कलम हूँ,
मुझमें ताकत भरपूर।
किसी का खोलूँ कच्चा चिट्ठा,
तो किसी का बनूँ गुरूर।
मैं एक कलम हूँ,
न रखती किसी से बैर-भाव, न ही किसी से द्वेष।
न मेरे लिए छोटा कोई, न ही कोई विशेष।
न जात-पात का भेदभाव, न कोई पक्षपात—
राजा हो या रंक, सभी का देती हूँ मैं साथ।
सही तरह उपयोग करो तो मैं हूँ एक तलवार,
मेरे आगे टिक न पाए कोई ऐसा है मेरा वार।
ज्ञान-जगत के लिए सदा मैं हूँ एक वरदान,
अदनी-सी दिखती हूँ, फिर भी है प्रखर पहचान।
रुचि अग्रवाल
समकालीन हिंदी लेखन की एक संवेदनशील और उभरती हुई सशक्त आवाज़ हैं, जिनकी लेखनी भावनाओं की गहराई और सहज अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती है। गीतों के बोल (लिरिक्स), मुक्त कविताएँ, लेख और आलेख हर विधा में उनकी रचनात्मकता अपनी अलग पहचान बनाती है। उनकी रचनाएँ जीवन के अनकहे एहसासों, रिश्तों की सूक्ष्म परतों और मन के अंतर्द्वंद्व को बड़ी सहजता और प्रभावशीलता के साथ शब्दों में ढालती हैं। यही कारण है कि पाठक उनकी रचनाओं से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं। रुची अग्रवाल अनेक चर्चित साझा काव्य-संकलनों—“वंदे मातरम”, “सुनहरी सहर”, “ज़िन्दगी कैसी है पहेली”, “काव्य मणिका”, “उत्सव ज़िन्दगी का”, “Locked Hearts”, “Floral”, “The Dusky Sunrise”, “The Dusky Moon”, “Love Sweet Refrain” और “The Spring” में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं।राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित S7 National Level Poetry Contest में विजेता बनकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। विभिन्न मंचों से प्राप्त मेडल, प्रमाण-पत्र, ट्रॉफियाँ और प्रशंसा-पत्र उनकी रचनात्मक उपलब्धियों के साक्षी हैं। उनकी एकल काव्य-कृति “बातें कुछ अनकही सी” उनके भाव-जगत का सुंदर और मार्मिक प्रतिबिंब है जो पाठकों को अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है।
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