
डॉ. करुणा सिन्धु, ऐशबाग, लखनऊ
तब कलश में भरा गया था
शुक्ल पक्ष का जल,
जब चैत्र में तुम आई थी…
जब तुम मुस्कराई थी
मेरे सामने बैशाख में,
तब खेतों में पका था गेहूँ…
जब बरसात में
तुमने खटखटाया मेरा दरवाज़ा,
तब तालाब, झीलों, नहरों
और खेतों की नस-नस में
पहुंचा था पानी…
जेठ की तपती दुपहरी में,
जब सड़क के किनारे
खड़ी थी तुम प्रतीक्षारत,
तब खिला था
अमलतास का गाढ़ा पीला फूल…
दीपावली में, जब लिखा
तुमने मुझे पत्र,
तब गन्ने के
पोर-पोर में समाया था रस…
याद होगा तुम्हें
जब होली में बुलाया था
तुमने मुझे,
तब उड़ा था
गुलमोहर का गुलाल…
और फिर…
जैसे पीपल का पत्ता
अलग हो जाता है
पतझड़ में अपने पेड़ से,
वैसे ही बिछड़ गए
सब मौसम…
पर एक दिन—
मौसम लौटता ज़रूर है,
जैसे लौटता है चन्द्रमा
अमावस के बाद…
