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नौतपा की तपती दोपहर में धूप से झुलसी सड़क, गर्म हवाएं और गर्मी से बचाव के पारंपरिक पेय दर्शाता दृश्य

नौतपा

नौतपा की तपती दोपहरी, लू की मार और गर्मी से राहत के घरेलू उपाय इन सबको सरल लोकभाषा और सहज भाव में प्रस्तुत करते ये दोहे मौसम का चित्र भी उकेरते हैं और सावधानी का संदेश भी देते हैं।

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एक भावनात्मक दृश्य जिसमें एक व्यक्ति पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा है, पतझड़ के पत्ते गिर रहे हैं और आसपास बदलते मौसम के साथ प्रकृति में आशा और स्मृतियों का प्रतीकात्मक चित्रण है

मौसम लौटता है ज़रूर

“मौसम लौटता है ज़रूर” एक संवेदनशील कविता है जिसमें ऋतुओं के माध्यम से प्रेम, बिछड़न और उम्मीद को बेहद खूबसूरती से व्यक्त किया गया है। यह कविता जीवन के चक्र और भावनाओं की गहराई को छूती है।

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सर्दियों की ठंडी सुबह का यथार्थ दृश्य, हल्की धुंध से ढकी भारतीय गली, शॉल और ऊनी कपड़ों में लिपटे लोग, आग के पास हाथ सेंकते बुजुर्ग, चाय के कप लिए महिलाएं और जैकेट पहने बच्चे.

सर्दी का मौसम

ठंडी हवा ने जैसे पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया था. सुबह की धुंध गलियों में चुपचाप उतर आई थी और सूरज की किरणें मानो रास्ता तलाश रही थीं. लोग शॉल और स्वेटर में सिमटे, कदम धीरे-धीरे बढ़ा रहे थे. हर मोड़ पर चाय की भाप उठती दिखती थी, जो ठिठुरते बदन को थोड़ी राहत देती थी. कहीं बुजुर्ग आग के पास हाथ सेंकते नजर आते, तो कहीं बच्चे ठंड से सिकुड़ते हुए भी स्कूल की राह पकड़ते थे. यह सर्दी केवल मौसम नहीं थी, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चाल को थाम लेने वाली एक खामोश ताकत बन चुकी थी.

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