शून्य में गूँजती आवाज़ें

मंजूलता, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा

तेरे जाने के बाद
क्या-क्या न बदला
दिन होता रहा,
रात होती रही।

फूल खिलते रहे,
चाँद उगता रहा।
प्यास लगती रही,
पेट कुछ माँगता रहा।

बदला तो सिर्फ़
दृष्टि
वही रही,
पर दृश्य बदला नज़र आने लगा।

जिधर भी देखा,
दुनिया बेरंग दिखी
सपाट, श्वेत,
बिना हलचल के।

नदी की कल-कल में
संगीत नहीं,
बस छलछलाहट
सुनाई पड़ने लगी।

परिंदों की चहचहाट
कानों में
चुभने लगी।

जानती हो क्यों?
क्योंकि तुम मुझसे दूर
चली गई
दूर, बहुत दूर।

आवाज़ भी दूँ तो
शून्य से टकराकर
लौट आएगी।

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