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एक पाती मुसाफ़िर के नाम…

जाने से पहले की वह आख़िरी मुलाक़ात जहाँ मौसम, सड़कें, पेड़ और खामोशी तक हमारी बातों के साक्षी बने। मीठी यादों, अनकहे जज़्बातों और एक गलतफ़हमी के बीच खड़ी चुप्पी की दीवार, जो आज भी लौटने से रोकती है।

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शून्य में गूँजती आवाज़ें

तेरे जाने के बाद, फूल खिलते रहे और चाँद उगता रहा, पर दुनिया बेरंग और सपाट दिखने लगी। नदी की कल-कल में संगीत नहीं, बस छलछलाहट सुनाई पड़ने लगी। परिंदों की चहचहाट भी अब चुभने लगी, क्योंकि तुम मुझसे बहुत दूर चली गई। आवाज़ भी दूँ तो शून्य से टकराकर लौट आती है।

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“मिलन और बिछोह

**Excerpt:**

कुछ लोग ज़िंदगी में ऐसे मिलते हैं जैसे उनका मिलना तय था — न पहले, न बाद में। वे आते हैं, अपना किरदार निभाते हैं और चले जाते हैं, जैसे कभी थे ही नहीं। पीछे रह जाती हैं उनकी यादें, फोन में उनका नंबर, कुछ जगहें जो अब भी उनकी मौजूदगी की खुशबू से भरी हैं। मिलना जितना सुख देता है, बिछड़ना उतना ही गहरा दर्द छोड़ जाता है।

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