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“मिलन और बिछोह

मीनाक्षी वर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली

कितने ही लोग हमें ऐसे मिले, जैसे शायद मिलना तय था। वो उससे पहले नहीं आए, न बाद में आएंगे। अपना रोल निभाकर चले भी गए — बिछड़ गए जैसे हम कुछ थे ही नहीं। क्यों हो जाता है ऐसे? शायद यही नियति होती है — ईश्वर की कलम से लिखा कि “इतना ही रोल था, अब आगे चल।”
वो चले जाते हैं, पर उनके नंबर और तस्वीरें फोन में रह जाती हैं। मन में उनकी यादें तिलमिलाती हैं। कोई चीज़ देखकर याद आता है — “उसे ये बहुत पसंद था…” या “उसे ये अच्छा नहीं लगता था…” कोई जगह देखकर लगता है — “हम यहीं तो मिलते थे, बैठा करते थे, घंटों हंसा-बोला करते थे…”
फिर कुछ घटनाएं होती गईं, वो दूर होते गए, और एक दिन पूरी तरह संपर्क टूट गया। हमने रोका नहीं, और वो रुका नहीं। एक जाना-पहचाना नंबर आज भी फोन में है, पर उसे मिला नहीं सकते। शायद वो उठाएगा भी नहीं।
इस डर से, इस अहंकार से — हम उससे कभी बात नहीं करेंगे, और वो भी नहीं करेगा।
मिलना जितना खुशी भरा होता है, बिछड़ना और वियोग उतना ही दर्द देता है।

6 thoughts on ““मिलन और बिछोह

  1. शायद दोनों ओर से अंहकार ही तो है। हमें एक दूसरे से मिलने से रोकता है।आज के समय का कटु सत्य है। समसामयिक घटनाचक्र पर सुंदर एक लेख।

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