कहानी
प्यारी मुस्कान
यह कहानी गीत नाम की एक युवती की है, जो जीवन की कठिनाइयों और अकेलेपन से जूझ रही होती है। एक दिन पार्क में एक छोटे बच्चे की मासूम मुस्कान और एक गुलाब उसके जीवन में नया उजाला ले आता है। यह कहानी बताती है कि छोटी-छोटी खुशियाँ भी जीवन को बदल सकती हैं और सुकून दे सकती हैं।
जीने के लिये
यह कहानी एक युवती की है, जो सपनों के साथ दिल्ली आती है, लेकिन पहले ही दिन उसे कठिन वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है। खराब कमरे और असहयोगी माहौल के बावजूद वह हार नहीं मानती। अपने आत्मविश्वास और जज़्बे से वह हालात को बदल देती है। यह कहानी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करती है, जो जीवन में संघर्षों के बीच भी आगे बढ़ना चाहता है।
एक कतरा प्यार
वह मुझसे नहीं, मेरे वजूद के सिर्फ एक छोटे से अंश से प्यार कर बैठा। उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं कि मेरे बाकी हिस्सों में कितनी कहानियाँ, कितने घाव और कितनी चुप्पियाँ दबी पड़ी हैं। मेरी हँसी के पीछे छुपे आँसू, मेरे सुकून के पीछे की बेचैनी, और मेरी तन्हाइयों के पीछे की चीखें ये सब उसकी समझ से बहुत दूर हैं।
माँ एक दैवीय शक्ति
दिनभर की भागदौड़ के बाद भी जाह्नवी के मन में अपनी नन्ही बेटी की यादें बेचैनी बनकर उमड़ती रहीं। अंधेरी राहों पर अकेले चलती हुई माँ की यह यात्रा सिर्फ घर लौटने की नहीं, बल्कि मातृत्व की उस दैवीय शक्ति का प्रमाण थी जो हर बाधा को पार कर जाती है। जब मन सच्चा हो, तो ईश्वर भी मददगार बनकर रास्ते में उतर आते हैं।
दौड़
**Blurb:**
कहानी *“रेस”* आधुनिक प्रकाशन जगत की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ प्रतिभा नहीं, नाम बिकता है। एक साधारण लेखिका की शानदार कहानी केवल इसलिए अस्वीकृत कर दी जाती है क्योंकि उसके पास कोई पहचान नहीं। संपादक के लिए रचनाएँ नहीं, “ब्रांड” मायने रखते हैं। सहायक आलोक के भीतर उठता द्वंद्व और अंत में उसकी मजबूर चुप्पी – यही इस कहानी का दर्द है। यह सिर्फ एक दफ्तर का दृश्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की झलक है जहाँ शब्दों की जगह प्रसिद्धि का शोर गूँजता है।
“मिलन और बिछोह
**Excerpt:**
कुछ लोग ज़िंदगी में ऐसे मिलते हैं जैसे उनका मिलना तय था — न पहले, न बाद में। वे आते हैं, अपना किरदार निभाते हैं और चले जाते हैं, जैसे कभी थे ही नहीं। पीछे रह जाती हैं उनकी यादें, फोन में उनका नंबर, कुछ जगहें जो अब भी उनकी मौजूदगी की खुशबू से भरी हैं। मिलना जितना सुख देता है, बिछड़ना उतना ही गहरा दर्द छोड़ जाता है।
एक मुलाकात दीवारों के साथ
एक दीवारों से मुलाकात का अनुभव, जहाँ बचपन, जवानी और यादों की आवाज़ें जीवंत हो उठती हैं। दीवारें सिर्फ मकान का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे एहसासों, मासूमियत और शरारतों की साझेदार होती हैं। समय के रंग और स्मृतियों की गूंज दीवारों पर जिंदा रहती है, और एक छोटी सी बॉल, एक बच्चा, और पुरानी यादें हमें हमारे अतीत की ओर खींच लेती हैं।
रेशमी कंबल
मीनाक्षी वर्मा, लेखिका, नई दिल्ली बहुत पुराने वक्त की बात है। सीताराम नाम का एक आदमी झोपड़ी में रहता था और मजदूरी किया करता था। एक बार मजदूरी करते वक्त उसने एक आदमी को रश्मि कम्बल बेचते देखा। कम्बल देखकर उसका उसे खरीदने का मन हुआ, लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे।वह घर आकर भी…
अनसुने हीरो को पहचान दिलाने की पहल
हम डिजिटल मीडिया की ताकत का उपयोग करते हुए प्रेरणादायक व्यक्तियों, संस्थाओं और विचारों की कहानियों को दुनिया तक पहुंचाते हैं. हमारा उद्देश्य केवल कहानियां साझा करना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव की एक नई लहर शुरू करना है.
हम विशेष रूप से उन अनसुने हीरो को सामने लाना चाहते हैं, जो बिना किसी पहचान या प्रचार के जमीनी स्तर पर लगातार काम कर रहे हैं. ये वही लोग हैं जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देती है, लेकिन असल बदलाव की नींव यही रखते हैं.
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