
अंजू निगम, प्रसिद्ध लेखिका, लखनऊ
“मैं जीतने के लिये बनी हूँ।” यही मेरी टैगलाइन थी।
नौकरी का ऑफर लेटर मिलते ही, घरवालों से बगावत कर मैं दिल्ली आ तो गई थी। ब्रोकर से बात करके एक कमरे का इंतज़ाम भी कर लिया था। खुश थी कि पहला पायदान तो पार किया।
सामान सहित जब उस छह बाई आठ के कमरे में दाखिल हुई, तो जिस वेल-फर्निश्ड घर के सपने ब्रोकर ने दिखाए थे, वे धूल चाटते नजर आए। उस दड़बेनुमा कमरे में वह सारा फर्नीचर तो था, जिसका वादा किया गया था मगर बेहद लचर हालत में।
ब्रोकर अपने पैसे ले चुका था, और अब उसका फोन बंद आ रहा था। मुझे मालूम था कि अब वह फोन उठाएगा भी नहीं।
मकान मालिक दूसरे शहर में रहते थे। उन्होंने फोन उठाया
“कौन बोल रहा है?” उनकी रौबदार आवाज सुनकर मेरी हिम्मत कुछ कम पड़ गई।
“सर, मैंने आपके लाजपत नगर वाले फ्लैट नंबर 230 में आज ही शिफ्ट किया है। फर्नीचर बहुत खराब हालत में है, फ्रिज और ए.सी. भी काम नहीं कर रहे…”
मैं आगे कुछ कहती, उससे पहले ही उन्होंने कहा
“आपको कमरा देख कर लेना था। मैं ब्रोकर को बोल दूँगा। तब तक एडजस्ट कीजिए।”
और फोन कट गया।
मुझे अपना घर याद आने लगा खुला, हवादार।
यहाँ तो कमरे की इकलौती खिड़की भी कॉमन गैलरी में खुलती थी… उसे खोलूँ भी तो कैसे?
मेरे सपने जैसे रूई के बादल बनकर उड़ने लगे थे।
मन हुआ कि उठूँ और वापस चली जाऊँ…
पर आज मेरा पहला दिन था और मुझे हर हाल में हालात का सामना करना था।
“हर दिन एक सा नहीं होता” मैंने खुद को यही समझाया।
जो कुछ था, सामने था… और उसी को मुझे बदलना था।
तन की थकान को झटक कर मैंने काम शुरू किया।
शाम तक
मैं और मेरा कमरा…
दोनों एक नए रूप में थे।
अब वह रहने लायक था
और मैं…
अब भी वही थी
“मैं तो जीतने के लिये बनी थी।”
ये रचनाएं भी पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें-
तुम खो गए हो
राज़-ए-ज़िंदगी
सूर्य वंदना
खुद पर भरोसा रख

शानदार। जीवन का हर पल चुनौतियां से भरा होता है। आपने बहुत अच्छे शब्दों में इसी का चित्रण किया है। उत्कृष्ट लेखन हेतु असंख्य शुभकामनाएं।
Inspirational ❤️
Thanks a lot moshmi
बेहद शुक्रिया करती हूँ भैयाजी