
अंशु जैन, प्रसिद्ध लेखिका, देहरादून
तुम खो गए हो,
क्यों साथ चलते-चलते,
कि तुम ही तो जीने का
सबब बन गए थे।
कहाँ है हँसी, कहाँ है मिलन,
जाने ये क्या हो गया,
ख़्वाबों का मिलना नहीं था सनम,
इश्क़ वो हक़ीक़त था
कि तुम ही फ़िज़ा की
बहार बन गए थे।
ठंडी हवा, ये काली घटा,
रह-रह के फिर याद उमड़ी,
आँसू का धागा, यादों का हार,
आओ पेश तुमको करूँ
कि तुम मेरे गीतों की
जान बन गए थे।
तुम खो गए हो,
क्यों साथ चलते-चलते…
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