खुद को हारकर, खुद को पा लिया
यह एक ऐसी महिला की प्रेरक जीवन-यात्रा है, जिसने बच्चों को शिक्षित करने के अपने जुनून से शुरुआत की, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों के लिए अपने सपनों को पीछे छोड़ दिया। वर्षों तक बुजुर्गों की सेवा करते-करते उसने स्वयं को भुला दिया। फिर एक दिन आत्म-अभिव्यक्ति की शक्ति ने उसे नई पहचान दी। यह कहानी समर्पण, संघर्ष, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास के पुनर्जन्म की सशक्त मिसाल है।
