
डॉ. अनामिका दुबे निधि, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
गर है तुम्हारी तमन्ना हमें बदनाम बनाने की,
इतनी भी क्या जल्दबाज़ी है ये इल्ज़ाम बनाने की।
हम खुद ही मौके देंगे तुम्हें, ये वादा रहा,
अभी तो कोशिशें जारी हैं बस नाम बनाने की।
जो लोग लगे हैं हमें हर तरफ़ से गिराने में,
वो सोच में डूबे हैं अब अपने ही अंजाम बनाने की।
हमारी ख़ामोशी को तुम कमज़ोरी न समझ लेना,
ये आदत नहीं है हर बात को पैग़ाम बनाने की।
हम ठोकरों से सीखकर आगे ही बढ़ते आए हैं,
हमें तो फितरत है हर दर्द को भी काम बनाने की।
जो आज हँस रहे हैं मेरी हर एक नाकामी पर,
कल बात करेंगे वही मेरे मुकाम बनाने की।
ये आग सीने में जलती है कुछ कर दिखाने को,
हमने तो ठान ली है नई हर पहचान बनाने की।
नज़रें उठाकर देखो तो हम भी वही हैं लोग,
बस जिद है दिल में अब खुद को आसमान बनाने की।
जो साथ न आए सफ़र में, उन्हें क्या गिला करें,
हमें तो आदत है तन्हा ही हर राह बनाने की।
“निधि” ये हुनर भी मिला है हमें वक्त की ठोकर से,
हर ज़ख्म को शेर में ढालकर गुलिस्तान बनाने की।
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