
कंचनमाला “अमर”(उर्मी
भाव अपने न तू बढ़ाया कर,
ज़िन्दगी घर तू मेरे आया कर ।
नर्मियां जी़स्त की ज़रूरत है,
बाअदब उससे पेश आया कर।
ज़िन्दगानी बहुत रुलाती है,
फिर भी उसको गले लगाया कर।
ख़्वाब बिखरे तो क्या हुआ आखिर,
हौसलों को न यूं गिराया कर।
लोग बातों की बात करते हैं,
कुछ भी दिल का न यूं बताया कर।
रोशनी को पकड़ न हाथों में ,
दीप से दीप को जलाया कर।
साथ देती है रूह अपनी ही,
फासले ख़ुद से ना बढ़ाया कर।

वाह वाह, बहुत खूब ….सुंदर अभिव्यक्ति दी