
डॉ. अनामिका दुबे “निधि”, मुंबई
मेरे वजूद में एक रत्न उभरना बाकी है,
अभी तो ख़ुद को थोड़ा सँवरना बाकी है।
अभी ये ख़ाक ही सही, मगर यक़ीं है मुझको,
इसी ज़मीं से कभी चाँद उतरना बाकी है।
नज़र में लोग मुझे आँकते रहे कमतर,
मगर मुझे तो अभी ख़ुद को निखरना बाकी है।
जो ठोकरों में रहा, वही सँभालेगा ताज,
मेरे नसीब में वो दिन सँवरना बाकी है।
अभी तो दर्द की गलियों में भटकता हूँ मैं,
मगर मुझे भी कभी हँसकर गुज़रना बाकी है।
ये आँधियाँ भी थकेंगी, ये रात ढल जाएगी,
मेरे सफ़र में नया सूरज उतरना बाकी है।
“निधि” ये वक़्त है मेहनत का, सब्र का दौर है,
अभी तो ख़्वाब को हक़ीक़त में ढलना बाकी है।
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