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आत्ममुग्धता

अहंकार में डूबा व्यक्ति, चारों ओर धूल और धुंध, पीछे जलती हुई बगिया और प्रतीकात्मक अराजकता

मैत्रेयी त्रिपाठी “मुग्धा “ मुंबई

जब तीव्र वायु के वेग में,धूल छूती है गगन ।
मौन कंकर देखता,अपनी ही धुन में मगन ।।

कहकहे अपनी अना के वही लगाते हैं यहाँ ।
कारगुजारियों से जिनके जले अपना चमन।।

बन बारूद फूँकते हो जिस बगिया को तुम।
रक्त के गारे से जोड़ा गया है ये अपना वतन ।।

शिखा भी सहमी खड़ी अज्ञान के बारूद पर ।
आत्ममुग्धता मन मोहती,नग्नता बसती नयन ।।

धूल जो उड़ती गगन में चक्षुओं को चुभती सदा।
ज्यों विद्वता है जंग खाती बैठ मूर्खों के सदन।।

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