तलाश

ज़िंदगी में तलाश रास्तों की नहीं, मंज़िल की होती है। इंसान कभी-कभी जीवन की भीड़ में इतना आगे बढ़ जाता है कि खुद से ही दूर हो जाता है। सुख चैन नहीं लेने देता और दुख नींद छीन लेता है, पर हम मुस्कुराते हुए सब झेलते हैं जैसे बेफ़िक्री में गुज़र रही ज़िंदगी को बस देखते जा रहे हों। असल खोज जीवनभर खुद को पाने की ही रहती है।

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अधूरे पन्नों का सफ़र

मन अपनी ही दिशा में चल पड़ा अनजान रास्तों पर, आशाओं की छोटी-सी गठरी लिए। पीछे छूटती भीड़ के चेहरों में भावनाओं का तूफान था, पर आगे अभी कई पन्ने लिखे जाने बाकी थे। अल्पविरामों की इस यात्रा में पूर्ण विराम कहीं दूर, किसी नए मोड़ पर इंतज़ार करता दिखा।”

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किसको ढोओगे

कविता सत्ता, समाज और मानवता पर गहरा प्रश्न उठाती है। कवि पूछता है. आखिर तुम किसे अपने कंधों पर उठाओगे, किसे बचाओगे? जब नैया मझधार में डूबेगी, तब कौन किसे पार लगाएगा? सत्ता की लालसा में जो सबको मिटा देने की सोच है, वही अंततः विनाश का कारण बनेगी। भारत की धरती हर धर्म, हर जाति का आंचल है. यहाँ कीचड़ में भी कमल खिलता है। लेकिन जब राजनीति भाजन का रूप लेती है, तब वही ताक़त अपने ही हाथों से हार जाती है। गरीब, सच्चे, उज्जवल मन वाले लोग पूछते हैं. क्या हर चुनाव में बस हम पर ही डोरे डालोगे, क्या सबको साथ में मारोगे?

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चिंता छोड़, सार्थक चिंतन की ओर

“चिंता सचमुच चिता समान है। जीवन की अनहोनी को रोका नहीं जा सकता, पर छोटी-बड़ी चिंताओं से कैसे निपटना है, यह हमारे हाथ में है। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और शत्रु उसका मन ही है—इंद्रियों के मोह में फँसा तो बंधन, और निर्विकार रहा तो मुक्ति। आँखें, कान, हृदय और मस्तिष्क—ये सब मिलकर हमारी चिंताओं का जाल बुनते हैं। गीता हमें सिखाती है कि सकारात्मक चिंतन और समदृष्टि अपनाकर ही मनुष्य चिंता से चिंतन की ओर बढ़ सकता है। मन का घर तभी स्वस्थ है जब उसमें प्रेम और संतुलन हो।”

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