हमारी प्राचीन परंपरा में एक कहावत प्रचलित है— “चिंता चिता के समान होती है।”
यह मात्र अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि जीवन की कटु वास्तविकता है। मैं स्वयं इस दुविधा से गुज़र रही हूँ। जानती हूँ कि जो होना है, वह होकर रहेगा। प्रकृति की अनहोनी को टाला नहीं जा सकता। जीवन की अन्य चिंताएँ—जो आती-जाती रहती हैं—उन्हें कैसे संभालें, यह हम पर निर्भर करता है।
मन अनियंत्रित इच्छाओं का वाहन है। यह ख़्वाहिशों और सपनों का सौदागर है, जो दिखता तो कहीं नहीं, परंतु हमारे पूरे जीवन को नियंत्रित करता है। जन्म से मृत्यु तक मनुष्य मोह के जाल में जकड़ा रहता है। जैसे पेट स्वाद नहीं माँगता, वह जीभ का दोष है; ठीक वैसे ही जीवन हमसे कुछ नहीं माँगता। हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियाँ ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं।
आँखें न होतीं तो हम गुण-अवगुणों को नज़रअंदाज़ कर देते। अच्छा-बुरा इन्हीं की बदौलत देखते हैं, जिससे भावनात्मक और शारीरिक समस्याएँ बढ़ती हैं—चाहे वह प्रेम हो या अपराध। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानेनावृत्य देहिनम्॥”
(इंद्रियाँ, मन और बुद्धि उसके आधार हैं। ये ज्ञान को ढककर जीव को मोहित करते हैं।)
यह श्लोक हमें स्मरण कराता है कि इंद्रियाँ हमें मोह के जाल में कैसे फँसाती हैं।
कान भी अपनी श्रवण-शक्ति से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अच्छा सुनना या बुराई ग्रहण करना चिंता को बढ़ाता है। कहते हैं, दीवारों के भी कान होते हैं—इसमें कोई दो राय नहीं।
नाक चिंता की वजह नहीं, परंतु दम्भ की जननी है। सामाजिक हिंसा हो या व्यक्तिगत अहंकार, यह सब उसी का परिणाम है।
हृदय सार्थक और निरर्थक संवेदनाओं से भरा रहता है। प्रेम, स्वार्थ, नफ़रत आदि अपराधों की श्रेणियाँ इसी की देन हैं और चिंता की सबसे बड़ी वजह भी। दिमाग—मानव शरीर का सबसे ख़तरनाक और शातिर अंग—अपने इशारे से सृष्टि को नष्ट करने की हिम्मत रखता है, साथ ही सृजन की ताक़त भी। इसकी सोचने की क्षमता हमें चिंता में डालती है। यह चिंतन हमें अर्श से फ़र्श तक पहुँचा सकता है, तो चिंता से चिता तक भी। यदि सोच सकारात्मक न हो, तो जीवन में नकारात्मकता और विनाश निश्चित है।
“मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।
बन्धाय विष्यासक्ता मुक्त्यै निर्विषयात्मनि॥”
(मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है। विषयों में आसक्त हो तो बंधन, निर्विषय हो तो मुक्ति।)
यह श्लोक मन की दोहरी भूमिका को रेखांकित करता है।
सृष्टि का सबसे बुद्धिमान जीव—मानव—समाज, देश और विश्व को बना भी सकता है और नष्ट भी कर सकता है। इंसानी सोच ही चिंतन-मनन के साथ हमें आगे बढ़ा सकती है। माँ का गर्भ ही एकमात्र सुरक्षित स्थान है। जन्म के साथ ही हम समस्याओं के मायाजाल में फँसते जाते हैं। सृजनकर्ता स्वयं चिंता में पड़ जाता है।
देश के मुद्दे—आपराधिक गतिविधियाँ, सत्ता, जातिवाद, हिंसा, धर्म के नाम पर बँटवारे, ज़ायदाद के लिए अपनों की जान से खिलवाड़, वासनाओं की पूर्ति के लिए स्त्रियों पर हर तरह के अत्याचार—ये सब चिंता के गंभीर विषय हैं। यदि ये घटनाएँ समाज में न हों, तो इसके लिए सकारात्मक सोच अपनानी होगी।
“न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥”
(कोई भी प्राणी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्रकृति के गुणों से प्रेरित होकर कर्म करने को बाध्य हैं।)
यह श्लोक हमें कर्म की अनिवार्यता और सकारात्मक कर्म की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
आधुनिकता के नाम पर कई आडम्बर फैले हैं। रोक हमें स्वयं लगानी होगी, सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। तभी हम चिंताओं को छोड़ सार्थक चिंतन की ओर बढ़ सकेंगे। अंत में, एक विश्वयुद्ध और होना चाहिए—इंसानी अभिव्यक्ति का, विचारों का, अपराधों का, बँटवारे का, जातिवाद का, धर्म का, मतभेदों का। यह देखना रोचक होगा कि सदियों से चले आ रहे इन फ़िज़ूल मुद्दों में जीत किसकी होती है? यह भी चिंता का विषय है, पर सकारात्मकता के लिए यह चिंतन अनुचित नहीं। सोचें, आत्ममंथन करें—क्योंकि हम अमरत्व लेकर पैदा नहीं हुए। जाना तो एक दिन सभी को है। फिर यह बेवजह की लालसा क्यों?
“आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥”
(जो पुरुष सुख और दुःख में सभी को अपने समान देखता है, वह योगी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।)
यह श्लोक हमें समदृष्टि और सकारात्मकता की ओर प्रेरित करता है।
एक नई सोच: हमारा घर, हमारा शरीर
हमारा घर हमारा शरीर है…
हृदय माँ… और दिमाग पिता…
हाथ, पाँव, कान हमारे सगे भाई हैं…
आँखें और जीभ सगी बहनें…
पिता जितना बुद्धिमान होगा, घर उतना बढ़िया होगा…
माँ का ममत्व सदाबहार रहेगा…
इस घर में मेहमान आते-जाते रहते हैं—कुछ अनुकूल, कुछ प्रतिकूल…
दोनों, माँ और पिता, के निर्देशों से घर चलता है…
यदि माँ-पिता प्यार से रहें, तो घर स्वस्थ रहता है…
यदि झगड़ें, तो प्रतिकूल मेहमान हावी हो जाते हैं…
घर में एक हवन-कुंड है—जिसे पेट कहते हैं…
यह हवन दोनों समयों नियमित चलता रहता है,
जो घर की व्यवस्था के लिए ऊर्जा प्रदान करता है…
यह विचारों का तीर्थ है…
विचार अपनी प्रगाढ़ कामना और भावना के साथ अनवरत भ्रमण करते रहते हैं,
क्योंकि इस घर में अखंड जाप चलता है…
यही सिद्धि का तीर्थ है… न होकर, तीरथ ही रहेगा।
“सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥”
(योगयुक्त आत्मा स्वयं को सभी प्राणियों में और सभी प्राणियों को स्वयं में देखता है, सब जगह समान दृष्टि से।)
यह श्लोक हमें शरीर को एक एकीकृत घर के रूप में देखने और सकारात्मक चिंतन से संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

सुरेखा अग्रवाल, प्रसिद्ध लेखिका, लखनऊ

वाह ! सुरेखा जी बहुत खूब लिखा है आपने
धन्यवाद मधु जी🙏
बहुत नई सोच , शरीर रूपी घर
इनके रहवासी एक सामूहिक भले की सोच से ही
प्रगतिशील हो सकते हैं ।