मन के भाव..

न के भीतर जन्म लेने वाले भाव ही रचना का आधार बनते हैं। रचनाकार हो, कलाकार हो या चित्रकार—हर सृजन उसी सूक्ष्म अनुभूति से आकार पाता है, जो मन में आहिस्ता से जन्म लेती है।
प्रकृति और परमात्मा ने इस सृष्टि में संतुलन रचा, पर जब मनुष्य अपने ही खुमार और कामना में डूब जाता है, तो यही संतुलन टूटने लगता है। जल, वायु और धरती का दूषित होना किसी बाहरी शत्रु की नहीं, बल्कि मानव की अपनी भूल की कहानी है।

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A lone figure standing at the edge of a quiet riverbank during early dawn, soft golden-blue light reflecting on the water. The person looks contemplative, gazing at gentle ripples as if questioning life’s truths. Surrounding nature appears symbolic—distant mountains, drifting

जीवन-मंथन

जीवन की हर बढ़ती घड़ी में मन बार-बार सवाल करता है सुख और दुख के इस लंबे सफ़र में हमने कितना देखा, क्या खोया और क्या पाया। माया अपनी चकाचौंध से हमें छलती रहती है, सत्ता और वैभव के प्रलोभन दिखाती है, और इन्हें पाने की चाह में हम अनगिनत अंधेरों से गुजरते हैं।

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ज़िंदगी आखिर कट ही जाएगी

ज़िंदगी अंत में कट ही जाती है चाहे हम मोहब्बत में डूबे हों या किसी की नफ़रत से लड़ रहे हों। कभी दर्द के साये में गुज़रती है, तो कभी हँसी की छोटी-सी किरण उसे रोशन कर देती है।
जीवन की यही सच्चाई है: दो पल का सफ़र, जो हाथ से फिसलते हुए भी हमें कुछ सिखा जाता है। खुशियाँ छोटी हों या बड़ी, बाँट देने से ही दिल हल्का होता है। ग़मों को अंदर दबाकर रखने से वे बोझ बन जाते हैं लेकिन किसी अपने के साथ उन्हें साझा कर लिया जाए तो वही दर्द ताकत में बदल जाता है।

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घर…

मैंने अपना घर किसी ईंट-पत्थर की दीवारों पर नहीं, बल्कि एक मधुर, दर्दभरी और सुरीली तान पर बनाया है। यह महज़ चार दीवारें और एक छत नहीं, बल्कि ऐसा स्थान है जहाँ भोर से लेकर संध्या और संध्या से रात तक संगीत बहता है। यहाँ संवाद की स्वतंत्रता है, त्याग और समर्पण का अहसास है, और रिश्तों के मौन बंधन भी। इस घर में पंछियों की चहचहाहट, पेड़ों की हरियाली, तितलियों के रंग और मिट्टी की गंध बसी है। यहाँ प्राणवायु संचार करती है और नादब्रह्म विचरता है। यह रंगों और सुगंधों से भरा, मिट्टी और खुले आसमान से जुड़ा एक निरामय संसार है।

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चिंता छोड़, सार्थक चिंतन की ओर

“चिंता सचमुच चिता समान है। जीवन की अनहोनी को रोका नहीं जा सकता, पर छोटी-बड़ी चिंताओं से कैसे निपटना है, यह हमारे हाथ में है। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और शत्रु उसका मन ही है—इंद्रियों के मोह में फँसा तो बंधन, और निर्विकार रहा तो मुक्ति। आँखें, कान, हृदय और मस्तिष्क—ये सब मिलकर हमारी चिंताओं का जाल बुनते हैं। गीता हमें सिखाती है कि सकारात्मक चिंतन और समदृष्टि अपनाकर ही मनुष्य चिंता से चिंतन की ओर बढ़ सकता है। मन का घर तभी स्वस्थ है जब उसमें प्रेम और संतुलन हो।”

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जिद्दी नदी…

नदी बड़ी जिद्दी है। उसे अपने खारेपन पर अड़ जाने की जिद है, अपने अस्तित्व को खोकर भी दरिया में समा जाने की चाह है। दरिया ने कितनी ही नदियों को अपने में समा लिया, फिर भी उसकी प्यास कभी बुझी नहीं। नदी अपनी मिठास खोकर खारी हो गई, लेकिन दरिया ने कभी उसकी मिठास नहीं अपनाई। उसकी लहरें न जाने किसकी तलाश में सदा बहती रहती हैं। सब नदियाँ अपने आप को खो चुकीं, फिर भी उसकी प्यास असीम बनी रही। नदियाँ सब मिलकर ही सागर बनाती हैं। पर यह सागर अब भी किसी सीप की आशा में छलकता रहता है। और तब याद आता है कि नदी केवल जलधारा नहीं, वह माँ भी है—हम सबकी माँ। जिसने हमें यह सिखाया कि खुद को खोकर ही सब कुछ पाया जा सकता है।

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