चाँदनी में खोया दिल

आज की रात चाँदनी बहुत मतवाली है। चाँद भी मानो सोच रहा हो कि उसकी तो अपनी दीवाली है। साँझ ढलते ही माँ घर में चुप हैं और सोच रही हैं कि अपने परिवार के लिए क्या पकाएँ, क्योंकि रोटी का तवा खाली है। वहीं हमदम भी यह सोच रहा है कि आस-पास बिखरा लाल रंग उसकी प्रिय की लाली का प्रतीक है। मैं जब उसे देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि खुद को ही भूल गया हूँ। ‘कनक’ अब इश्क़ में कंगाल हो चुका है, लेकिन यह मतवाली चाँदनी और प्रेम की लाली सब कुछ बयां कर देती है।

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ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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मौन..

जब मन, शरीर और आत्मा एकसमान और संतुलित स्थिति में होते हैं, तब वास्तविक मौन का अनुभव होता है। ध्यान और मौन के अभ्यास से हम न केवल अपने मन को नियंत्रित कर सकते हैं, बल्कि ब्रह्मांड की शक्तियों और जीवन के गहरे रहस्यों से भी परिचित हो सकते हैं। नकारात्मक विचारों की तरह मन की उर्जा भी बिखरती रहती है, जिससे निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। इसे शांत और सकारात्मक विचारों से भरकर, हम अपनी बौद्धिक क्षमता बढ़ा सकते हैं और आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यह अभ्यास निरंतरता और धैर्य मांगता है, पर धीरे-धीरे यह सुखद अनुभव और गहन आध्यात्मिक अनुभूतियों का मार्ग खोलता है।

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जो ठहर गए, वही असली कहानी हैं

सत्तर वर्ष की उम्र में जीवन ने सिखाया कि लोग आते-जाते रहते हैं, कुछ बसंत की तरह उजास और उम्मीदें लाते हैं, कुछ शीत की आँधी की तरह चले जाते हैं। युवावस्था में हर विदाई पीड़ादायक लगती थी, लेकिन समय और अनुभव ने यह समझाया कि जो लोग आपके लिए बने हैं, वे हमेशा लौटकर आते हैं। असली खुशी और जीवन की कहानी उन लोगों में है जो आपके साथ ठहरते हैं, आपकी आत्मा को समझते हैं और बिना किसी जोर-जबरदस्ती के आपके जीवन में बने रहते हैं।

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चिंता छोड़, सार्थक चिंतन की ओर

“चिंता सचमुच चिता समान है। जीवन की अनहोनी को रोका नहीं जा सकता, पर छोटी-बड़ी चिंताओं से कैसे निपटना है, यह हमारे हाथ में है। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और शत्रु उसका मन ही है—इंद्रियों के मोह में फँसा तो बंधन, और निर्विकार रहा तो मुक्ति। आँखें, कान, हृदय और मस्तिष्क—ये सब मिलकर हमारी चिंताओं का जाल बुनते हैं। गीता हमें सिखाती है कि सकारात्मक चिंतन और समदृष्टि अपनाकर ही मनुष्य चिंता से चिंतन की ओर बढ़ सकता है। मन का घर तभी स्वस्थ है जब उसमें प्रेम और संतुलन हो।”

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