
डॉ. कनकलता तिवारी, प्रसिद्ध साहित्यकार, मुंबई
आज की रात सनम चाँदनी मतवाली है
चाँद भी सोच रहा उसकी तो दीवाली है
बैठ कर सोचती है साँझ ढले माँ गुमसुम
क्या खिलाए उन्हें रोटी का तवा खाली है
साँझ ढलते हुए ये सोचता है हमदम भी
लाल ये रंग जो बिखरा ये उन की लाली है
देखता हूँ जो तुझे भूल गया खुद को ही
होश खो बैठा तेरी चाल यूँ मतवाली है
अब ‘कनक’ इश्क़ में कंगाल हुए फिरते हैं
आज हर सू ही मची देखो तो बदहाली है
