दास्तान ए जिंदगी
दास्तान-ए-ज़िंदगी” उस कहानी को बयां करती है जो काग़ज़ पर नहीं, आँखों की नमी में लिखी जाती है। जज़्बात कभी शब्द बनकर नहीं उतरते—वे खून की जुबान में अपनी दास्तान सुनाते हैं। चाँद को दिल में सँभाल कर रखने की मासूम हिदायत है, क्योंकि उसकी चाँदनी भी शरमाती है। रात की वीरानी, सूने सपने और ख़ामोश गलियाँ एक अकेलेपन का नक्श बनाती हैं। फिर भी किसी की मुस्कुराहट दिल की धड़कनों में रवानी भर देती है।
