Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
विरह में डूबी युवती, पायल और कंगन पहने, चाँदनी रात में खिड़की के पास बैठी, आँखों से अश्रुधारा बहती हुई, उदासी और प्रतीक्षा का गहरा भाव।

कैसे आऊँ मैं तुमसे मिलने…

यह रचना और दृश्य विरह के उस क्षण को दर्शाते हैं, जहाँ श्रृंगार, आभूषण और सपने सब धुल चुके हैं, और केवल प्रतीक्षा शेष है। पायल की झंकार और कंगनों की आवाज़ मन की उलझनों का प्रतीक बन जाती है। चाँदनी रात, कोरा काग़ज़ और पहरेदार बनी उदासी सब मिलकर प्रेम की उस पीड़ा को रचते हैं, जहाँ मिलने की चाह सबसे बड़ी व्याकुलता बन जाती है।

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इल्तज़ा

पंख थक गए हैं, तो एक बार मिलने आ जाओ। मैं भी कभी स्वच्छंद पंछी जैसा था। आंसुओं के समंदर को मत रोको, उन्हें वैसे ही बहने दो जैसे सावन की झड़ी बहती है। लिखे हुए खतों की सौगात शायद कोई लौटाए, लेकिन वही कमाल का जिगर ए यार होगा, जैसा मैं हूं। किताबों पर धूल जमने से कहानी नहीं बदलती, और मैं भी कभी पुरानी किताबों को पढ़ने जैसा हूं। आज तक कौन गया है इस मिट्टी के आगे? मैं भी उस धूल के मुख़्तसर ज़र्रे जैसा हूं। जानते हैं, लौटते वक्त कुछ भी साथ में नहीं ले जा सकते, फिर भी बचा लो यारों, थोड़ा सरण और कफ़न जैसा…

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चाँदनी में खोया दिल

आज की रात चाँदनी बहुत मतवाली है। चाँद भी मानो सोच रहा हो कि उसकी तो अपनी दीवाली है। साँझ ढलते ही माँ घर में चुप हैं और सोच रही हैं कि अपने परिवार के लिए क्या पकाएँ, क्योंकि रोटी का तवा खाली है। वहीं हमदम भी यह सोच रहा है कि आस-पास बिखरा लाल रंग उसकी प्रिय की लाली का प्रतीक है। मैं जब उसे देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि खुद को ही भूल गया हूँ। ‘कनक’ अब इश्क़ में कंगाल हो चुका है, लेकिन यह मतवाली चाँदनी और प्रेम की लाली सब कुछ बयां कर देती है।

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