आख़िर में…

ज़िंदगी भर मुखौटे पहनती रही. अच्छी बीवी”, “अच्छी बहू”, “बेबस मां” के।
नींद हमेशा अधूरी रही, काम हमेशा पूरे हुए।
जब आख़िरकार सुकून की नींद मिली, तब भी किसी ने झिंझोड़ कर जगा दिया।अब तो मैं बस यही कहना चाहती हूं . “मुझे अब तो सोने दो… अब कोई मुखौटा नहीं, कोई फ़र्ज़ नहीं. बस नींद।”

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चाँदनी में खोया दिल

आज की रात चाँदनी बहुत मतवाली है। चाँद भी मानो सोच रहा हो कि उसकी तो अपनी दीवाली है। साँझ ढलते ही माँ घर में चुप हैं और सोच रही हैं कि अपने परिवार के लिए क्या पकाएँ, क्योंकि रोटी का तवा खाली है। वहीं हमदम भी यह सोच रहा है कि आस-पास बिखरा लाल रंग उसकी प्रिय की लाली का प्रतीक है। मैं जब उसे देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि खुद को ही भूल गया हूँ। ‘कनक’ अब इश्क़ में कंगाल हो चुका है, लेकिन यह मतवाली चाँदनी और प्रेम की लाली सब कुछ बयां कर देती है।

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