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उफनते दरिया, टूटते पहाड़ : क़ुदरत से छेड़खानी का परिणाम

आज से पहले कभी न देखी…
पहाड़ों पर तबाही की ऐसी प्रलय..!
मानसून के इंतजार में यह कैसी विभीषिका,
दरिया तूफ़ानी ढाया सैलाब का सितम
चहुँ ओर है बरपाया फिर से क़हर..!

उफ़नाई नदियों ने यह कैसी भरी हुंकार..
रेत की तरह चरमरा कर टूट गए पहाड़
टूटती चट्टान, दरकते से पहाड़, इलाके वीरान!

धंस रहे रास्ते, हो रहे भूस्खलन…
बढ़ता जा रहा नदी-नालों का स्तर
जलमग्न हो रही धरती…
तांडव सा है मचा रखा पानी ने हर..!

सितम ढह रहा मैदानों में क्या कम??
सड़के तब्दील हो रही सैलाबों में..
ललकते निरीह मानव,
जान अपनी बचाने को आतुर
डूबते से आवासों में…
तैरती सी हो रही ज़िन्दगी…
बेबस जनमानस हुआ जा रहा बेहाल!

कैसी दस्तक है यह कायनात की..??
प्रकृति का बेबस हो..यह रुदन और क्रंदन ही..
देवकृत है या है मानव की लापरवाही ??

ग़हन विचारणीय विषय हो चला…
समय की सीमाएं पार हो चलीं अब!
कदाचित..!!
क़ुदरत से छेड़खानी का हो रहा है असर!!

सुमन दीक्षित, सुप्रसिद्ध लेखिका, कोलकाता

4 thoughts on “उफनते दरिया, टूटते पहाड़ : क़ुदरत से छेड़खानी का परिणाम

  1. मेरी रचना को अपने प्रतिष्ठित न्यूज़ पोर्टल में स्थान देने के लिए हार्दिक आभार आपका सर 🙏

  2. आज का भयावह सत्य ! अब समय है सुधार का। आपने अपनी कविता के जरिए सच से रूबरू कराया सुमन‌जी । सार्थक प्रयास।

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका सरहाना के लिए 🙏🙏

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