“मैं नारी हूँ पर अबला नहीं,
मेरे आँसुओं में कमज़ोरी नहीं,
बल्कि आग है, जो सबको झुलसा सकती है।”
यह नारी… ईश्वर की अनुपम रचना,
घर-आँगन में, खेत-खलिहान में गीतों-सी झूमती।
ममता की गागर, जीवन की धारा,
सृजन की मिट्टी से गढ़ी, करुणा से सींची।
लेकिन…
कभी भोग्या बना दी गई,
कभी जायदाद समझी गई,
कभी बंधनों में बाँध दी गई।
फिर भी वही नारी…
मातृशक्ति बनी,
महिषासुर का वध किया,
और कुल-परिवार की रक्षा करती रही।
अब वह तनकर खड़ी है,
अन्याय से डरती नहीं।
चुनौतियों से टकराकर
अपने अस्तित्व को आज़ाद कराती रही।
स्वतंत्र देश की स्वतंत्र नारी
नवयुग का स्वर्णिम आगाज़।
भाग 2: बदलती रूपरेखा
“कल की सुकुमार नारी,
आज विकास की अगुवाई करती नारी।”
उसकी नब्ज़ को आज भी कोई पूरी तरह पढ़ नहीं पाता,
जमाना अब भी कहता है — त्रिया चरित्र समझी नहीं जाती।
लेकिन जिसने भी झाँका उसके अंतर्मन में,
वहाँ आत्मविश्वास की गूंज सुनाई देती है।
अब वह लजाती नहीं,
संकोच में छिपती नहीं।
वह बोलती है, निर्णय लेती है,
नेतृत्व करती है।
सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक।
नई ऊँचाइयाँ
इसरो के चंद्रयान को गगन तक पहुँचाती,
डॉक्टर, वैज्ञानिक, सैनिक, कलाकार बनकर
हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ती।
नवयुग की पहचान
नारी अब किसी कैद में सिमटने वाली नहीं,
वह पुनरुत्थान की धुरी है,
देश-समाज-परिवार की धड़कन है।
बदलती नारी
नवभारत की नई पहचान।
यह श्रृंखला नारी की उस यात्रा का प्रतीक है,
जहाँ वह मुक्ति से आगे बढ़कर रूपांतरण की ओर बढ़ती है।
यह केवल नारी की नहीं, बल्कि पूरे समाज के
नए उदय की घोषणा है।

शारदा कनोरिया, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे
