सुबह की सुनहरी रोशनी में हाथ में चाय का प्याला लिए एक भारतीय महिला खिड़की के पास खड़ी है। बाहर ओस से भीगे फूल, दूर पहाड़ और बहता झरना दिखाई दे रहा है। वातावरण शांत, आत्मचिंतन और निःस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है।

निःस्वार्थ प्रेम

‘निःस्वार्थ प्रेम’ एक भावपूर्ण हिंदी कविता है, जो स्त्री के मौन, त्याग, धैर्य और प्रेम की गहराई को प्रकृति के सुंदर बिंबों के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। यह कविता बताती है कि समय के साथ स्त्री शिकायतों से नहीं, बल्कि अनुभवों से परिपक्व होती है। वह जीवन की कड़वाहट को मुस्कान में बदलना जानती है, बंधनों को पीछे छोड़ देती है और प्रेम के उस रूप को संजोए रखती है, जिसमें अधिकार नहीं, केवल समर्पण होता है। कविता पाठक को प्रेम, आत्मबल और स्त्री के अंतर्मन की अनकही दुनिया से परिचित कराती है।

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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मैं कब से थी नीर की बदरी

कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।

फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।

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मैं नारी हूँ पर अबला नहीं

मैं नारी हूँ, पर अबला नहीं। मेरे आँसुओं में कमजोरी नहीं है, बल्कि वह आग है जो सबको झुलसा सकती है। नारी ईश्वर की अनुपम रचना है। वह घर-आँगन और खेत-खलिहान में गीतों की तरह झूमती है। ममता की गागर और जीवन की धारा उसकी आत्मा में प्रवाहित हैं। वह सृजन की मिट्टी से गढ़ी गई और करुणा से सींची गई है।

फिर भी, कभी उसे भोग्या बना दिया गया, कभी जायदाद समझा गया, और कभी बंधनों में बाँध दिया गया। लेकिन वही नारी मातृशक्ति बनी, महिषासुर का वध किया और अपने परिवार की रक्षा करती रही। अब वह निर्भीक होकर खड़ी है, अन्याय से डरती नहीं और चुनौतियों का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को आज़ाद कराती है। स्वतंत्र देश की स्वतंत्र नारी नवयुग का स्वर्णिम आगाज़ है।

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