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उफनते दरिया, टूटते पहाड़ : क़ुदरत से छेड़खानी का परिणाम

पहाड़ों पर ऐसी तबाही पहले कभी नहीं देखी गई। मानसून का इंतजार कर रहे इलाकों में अब प्रलय का मंजर है। उफनती नदियों ने अपनी हुंकार से पहाड़ों को रेत की तरह तोड़ डाला है। चट्टानें दरक रही हैं, रास्ते धंस रहे हैं और जगह-जगह भूस्खलन हो रहा है। नदी-नालों का जलस्तर बढ़ने से धरती जलमग्न होती जा रही है और पानी का तांडव जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर रहा है।

मैदानों में भी हालात कम भयावह नहीं हैं। सड़के सैलाब में तब्दील हो रही हैं, लोग अपने घरों से विस्थापित हो रहे हैं और बेबस होकर जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। हर ओर त्राहि-त्राहि मची है।

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