न्याय का प्रतीक तराजू, एक ओर झुका हुआ संतुलन, विचारशील वातावरण

न्याय चेतना

“न्याय चेतना” एक विचारोत्तेजक लेख है, जो बताता है कि हम अक्सर दूसरों, अपनों और स्वयं के लिए अलग-अलग न्याय क्यों करते हैं। यह लेख निष्पक्षता, मानवता और धर्म के माध्यम से सच्चे न्याय की दिशा दिखाता है।

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गढ़ देवी माई: आस्था और कृपा का अनुभव

मेरे मायके के निकट मढ़ौरा (सारण) में गढ़ देवी माई का प्राचीन मंदिर है, जो अपनी कृपा और सबकी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए प्रसिद्ध है। वर्षों से उनके दर्शन की लालसा लिए मैं अवसर की तलाश में थी। आखिरकार, माता रानी ने मेरी प्रार्थना सुन ली और मैं अपने मंझले भैया के साथ गांव पहुंची।

वर्षों बाद अपने बाल्यकाल की धरती पर लौटना, पुराने संगी-साथियों और घर की यादों से मिलना अत्यंत सुखद था। दिसम्बर की ठंडी सुबह, घने कोहरे के बीच हम गढ़ देवी माई के दर्शन के लिए मंदिर पहुँचे। मां का अद्भुत सौंदर्य देखते ही मैं अभिभूत होकर भावुक हो उठी। माता ने अपने स्नेह और आशीर्वाद से हमें भर दिया—सपरिवार सुख और समृद्धि का आशीष।

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चिंता छोड़, सार्थक चिंतन की ओर

“चिंता सचमुच चिता समान है। जीवन की अनहोनी को रोका नहीं जा सकता, पर छोटी-बड़ी चिंताओं से कैसे निपटना है, यह हमारे हाथ में है। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और शत्रु उसका मन ही है—इंद्रियों के मोह में फँसा तो बंधन, और निर्विकार रहा तो मुक्ति। आँखें, कान, हृदय और मस्तिष्क—ये सब मिलकर हमारी चिंताओं का जाल बुनते हैं। गीता हमें सिखाती है कि सकारात्मक चिंतन और समदृष्टि अपनाकर ही मनुष्य चिंता से चिंतन की ओर बढ़ सकता है। मन का घर तभी स्वस्थ है जब उसमें प्रेम और संतुलन हो।”

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