कदंब तले

कदंब तले: राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम और भक्ति रस से सजी भावपूर्ण कविता

बबिता अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

कदंब तले हैं श्याम खड़े, नयनन से उनके रस बरसे,
राधा चित चुपके से पिघले, अधरन से अमृत रस बरसे।

बंसी की टेर सुनत-सुनत, गोपियों का मन भर-भर तरसे,
चंचल चितवन को छू ले, सावन झर-झर कर बरसे।

कुंतल की छाया है डोले, कपोलन पर लाज सी हरसे,
मंद-मंद पवन जब छू जाए, सावन की खुशबू रस बरसे।

कर-स्पर्श बिना ही साजन के, तन-मन क्योंकर यूँ तरसे,
साँसों में साँस समाय रहे, मधुबन में मधुर रस बरसे।

रजनी साक्षी बन बैठी, तारे सब झाँकें नभ पर से,
रास रचे दो प्राण जहाँ, पल-पल वहाँ रस बरसे।

‘कंवल’ का हिय-वृंदावन में, प्रेम-सुधा रस को तरसे,
श्याम-नाम जपते ही फिर, अंतरमन से रस बरसे।

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