निष्पक्ष न्याय और मानव मनोविज्ञान की सच्चाई

कंचनमाला अमर उर्मी, नई दिल्ली
न्याय चेतना तीन प्रकार की होती है
पहली, जो हम दूसरों के लिए करते हैं।
दूसरी, जो हम अपनों के लिए करते हैं।
तीसरी, जो हम स्वयं के लिए करते हैं।
अक्सर एक ही अपराध के लिए हम अलग-अलग परिस्थितियों और अलग-अलग व्यक्तियों के संदर्भ में भिन्न-भिन्न न्याय करते हैं। मानव मनोविज्ञान जितना जटिल है, उतना शायद ही कुछ और हो। यदि हम मानव मनोविज्ञान को समझें, तो यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य से अधिक स्वार्थी कोई जीव इस धरा पर नहीं है। इसके साथ ही यह भी उतना ही सत्य है कि इस संसार में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है, जो अपने सद्गुणों या अवगुणों को विकसित करके क्रमशः महात्मा या दुरात्मा बन सकता है वह देव भी बन सकता है और राक्षस भी।यह विशेष क्षमता परमात्मा ने केवल मनुष्य को ही प्रदान की है, किसी अन्य जीव को नहीं। यदि मनुष्य मानवता और धर्म को अपनाए, परमात्मा से जुड़कर अपनी चेतना को विकसित करे, तो वह तर्कसंगत और निष्पक्ष न्याय करने की क्षमता प्राप्त कर सकता है .चाहे वह दूसरों के लिए हो, अपनों के लिए हो या स्वयं के लिए।
ऐसा करने से न केवल न्याय की, बल्कि न्याय-प्रणाली और इंसानियत की भी साख बनी रहेगी। परिणामस्वरूप मानव समाज अधिक सुंदर, शांत और विकसित बन सकेगा, क्योंकि अन्याय ही समाज में क्लेश, ईर्ष्या और दुर्भावना जैसी नकारात्मक भावनाओं को जन्म देता है। अतः आवश्यक है कि हम धर्म को अपनाएँ, न्याय-व्यवस्था को समझें और परिस्थितियों के अनुसार उसका समुचित पालन करें।
कंचनमाला ‘अमर’ (उपनाम: उर्मी)
एक बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार एवं शिक्षिका हैं, जो नई दिल्ली के राजकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में विज्ञान विषय का अध्यापन करती हैं। उन्होंने M.Sc. (रसायन शास्त्र), M.Ed, M.A (कंठ संगीत) तथा B.A (कत्थक नृत्य) की उच्च शिक्षा प्राप्त की है और वर्तमान में शिक्षा शास्त्र में शोधरत हैं।
उनका एकल काव्य संग्रह “इसी रहगुज़र से” सहित कई साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं तथा अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी नव उदय साहित्य सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
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