धुंधले शहर की पृष्ठभूमि में अकेला शायर, न्याय के तराज़ू और बिखरे हुए मुखौटों का प्रतीकात्मक दृश्य

किसे गुनहगार कहें

“किसे गुनहगार कहें” एक समकालीन हिंदी ग़ज़ल है, जो समाज, न्याय व्यवस्था और नैतिक मूल्यों पर गहरी चोट करती है। हर शेर वर्तमान समय की विडंबनाओं को उजागर करता है, जहाँ सच और झूठ की सीमाएँ धुंधली होती दिखाई देती हैं। बाज़ारवाद, न्याय, आरोप और सफलता के बदलते अर्थों पर तीखा व्यंग्य करती यह ग़ज़ल पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। सरल लेकिन प्रभावशाली भाषा में लिखी गई यह रचना आज के सामाजिक यथार्थ का सशक्त प्रतिबिंब है।

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महाभारत की सभा में द्रौपदी की करुण पुकार, भगवान कृष्ण द्वारा चीर रक्षा का दिव्य दृश्य

द्रौपदी की करुण पुकार

सभा के मध्य खड़ी द्रौपदी की आँखों में भय, अपमान और आक्रोश एक साथ उमड़ रहे थे। चारों ओर सत्ता के प्रतीक उपस्थित थे, पर न्याय कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। शकुनि के छल से आरंभ हुआ यह खेल अब उसकी अस्मिता पर आकर ठहर गया था। दुर्योधन की क्रूर मुस्कान और दुःशासन की निर्दयता ने सभा को और भी भयावह बना दिया था।
भीष्म और धृतराष्ट्र जैसे महान भी मौन थे, मानो धर्म स्वयं बंधन में जकड़ा हो। उस असहाय क्षण में द्रौपदी के भीतर से केवल एक ही पुकार उठी—कृष्ण। उसने अपने समस्त अहंकार, भय और पीड़ा को त्यागकर स्वयं को पूर्णतः उस परम शक्ति के हवाले कर दिया। और तभी, जब मानवता ने साथ छोड़ दिया, आस्था ने उसका हाथ थाम लिया—अदृश्य होकर भी कृष्ण उसकी लाज की रक्षा के लिए उपस्थित हो गए।

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न्याय का प्रतीक तराजू, एक ओर झुका हुआ संतुलन, विचारशील वातावरण

न्याय चेतना

“न्याय चेतना” एक विचारोत्तेजक लेख है, जो बताता है कि हम अक्सर दूसरों, अपनों और स्वयं के लिए अलग-अलग न्याय क्यों करते हैं। यह लेख निष्पक्षता, मानवता और धर्म के माध्यम से सच्चे न्याय की दिशा दिखाता है।

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भीड़

भीड़ के बीच बैठी खून से लथपथ घबराई लड़की को युवक ने अपना कोट ओढ़ाकर उठाया, और तमाशा देखती भीड़ पर गुस्से से गरज उठा.“अगर आपकी बेटी होती, तो भी ऐसे ही खड़े रहते?”

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नारी द्वारा नारीत्व का परित्याग

समाज में नारी की भूमिका और नारीत्व आज गंभीर परिवर्तन का सामना कर रहा है। जहाँ सदियों से नारी को ममता, कोमलता और जीवन देने वाले स्वरूप के रूप में देखा गया, वहीं अब वही नारी कई परिस्थितियों में अत्याचार, विषाक्त जीवन और अन्याय के खिलाफ प्रचंड स्वरूप धारण कर रही है।

कई मामलों में नारी अपने बच्चों या परिवार के प्रति परंपरागत ममता के बजाय अपने जीवन के बंधनों से मुक्त होने का प्रयास करती है। यह कदम कभी-कभी उस विषाक्त वातावरण का प्रतिरोध होता है, जो उसे हर दिन मानसिक और शारीरिक रूप से चोट पहुँचाता है।

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‘मन निर्मोही’

स्वाभिमान की चोट से आहत मन ने पहले सहजता से सहा, फिर आक्रोशित होकर न्याय की उम्मीद में संघर्ष किया। विश्वविद्यालय और सचिवालय की सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते उसने सच्चाई के दबे-सिसकते स्वर को देखा। छल और प्रपंच के बीच भी उसने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा। परंतु जब न्यायालय की प्रक्रिया भी ठंडी पड़ी मिली, तो अंततः मन निर्मोही हो गया।

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