खामोशी में छुपा प्यार

खिड़की के पास बैठी एक युवती, शहर की रोशनी को देखते हुए गहरी सोच में डूबी है, हाथ में फोन है लेकिन वह किसी को संदेश नहीं भेज रही, चेहरे पर हल्की उदासी और अनकही मोहब्बत का एहसास झलक रहा है।

नीमा शाह, अहमदाबाद

सुनो..

कभी-कभी दिल चाहता है

कि तुम्हें बता दूँ…

कि मेरी हर खामोशी के पीछे

सिर्फ तुम्हारा ही नाम छुपा है।

पर फिर डर सा लगता है—

कहीं ये एहसास कह देने से

उसकी मासूमियत ही न खो जाए।

तुम्हें शायद खबर भी नहीं,

पर मेरी दुआओं की शुरुआत भी तुमसे है

और मेरी रातों की आख़िरी सोच भी तुम ही हो।

मैंने कभी इज़हार नहीं किया,

पर सच ये है—

मेरी रूह ने तुम्हें

खामोशी से अपना मान लिया है।

अजीब सी मोहब्बत है ये…

तुम अनजान हो अब भी,

और मैं तुम्हारे एहसास में

हर रोज़ थोड़ा और डूबती जा रही हूँ

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