हो जाओगे लापता : रूहानी प्रेम और भावनाओं पर हिंदी कविता

हो जाओगे लापता

यह कविता प्रेम की पवित्रता, आत्मिक जुड़ाव और भावनाओं की गहराई को खूबसूरती से व्यक्त करती है। इसमें मुहब्बत को वासना से अलग एक रूहानी एहसास के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

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बारिश भरी शाम में खिड़की के पास बैठा एक व्यक्ति डायरी में भावुक शायरी लिखता हुआ दिखाई दे रहा है, पास में जलती मोमबत्ती और वातावरण में प्रेम, शिकायत और अपनत्व की गहरी भावनाएं महसूस हो रही हैं।

तोहमत लगा दीजिए

“तोहमत लगा दीजिए” प्रेम, शिकायत और अपनत्व की भावनाओं से सजी एक नाज़ुक ग़ज़ल है, जिसमें रिश्तों की मिठास और दिल की गहराइयों को खूबसूरती से व्यक्त किया गया है।

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खिड़की के पास बैठी एक युवती, शहर की रोशनी को देखते हुए गहरी सोच में डूबी है, हाथ में फोन है लेकिन वह किसी को संदेश नहीं भेज रही, चेहरे पर हल्की उदासी और अनकही मोहब्बत का एहसास झलक रहा है।

खामोशी में छुपा प्यार

कभी-कभी प्यार शब्दों में नहीं, खामोशी में पनपता है। यह वही एहसास है जो दिल में चुपचाप जगह बना लेता है, बिना इज़हार के भी गहराता जाता है। इस अनकही मोहब्बत में एक सुकून भी है और एक हल्की सी कसक भी, जहां हर खामोशी के पीछे सिर्फ एक ही नाम छुपा होता है।

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पर्स में रखा दिल रोमांटिक हिंदी गद्य अहसास

जब दिल बोले…यहीं ठीक हूँ

उनके पर्स के किसी कोने में मेरा दिल रखा है—मेकअप की चीज़ों से घिरा हुआ। दिल कभी शिकायत करता है, कभी जिद करता है कि उसे वहीं रहने दो। वजह बड़ी मासूम है जब भी वह पर्स खोलती हैं, उनकी उँगलियों का स्पर्श दिल को ऐसा सुकून देता है कि सारी चुभन भूल जाती है। दिल मानता है कि सबसे महफ़ूज़ और मीठी जगह वही है, जहाँ अहसास बिना बोले छू लेते हैं।

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दिलरुबा और दिल

बिट्ट जैन सना, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई काम आई न दिल्लगी दिल की।ये कभी क्या हुई किसी दिल की। इश्क़ वालों के साथ ही अक्सर।ज़ेह्न से दुश्मनी हुई दिल की। आशिक़ी में है सिर्फ़ आह-ओ-फ़ुग़ाँ,कब हुई किसको आगही दिल की। दिल हमेशा जवान रहता है,उम्र बढ़ती नहीं कभी दिल की। आज उस दिलरुबा को देखा तो,ख़ुद-ब-ख़ुद…

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जरा जरा तू हमसे मिल कविता

जरा-ज़रा तू हमसे मिल

जरा जरा तू हमसे मिल, तनिक तनिक उतर मेरे दिल…” यह कविता प्रेम के उन कोमल एहसासों को छूती है, जहाँ शब्द कम और नजरों की भाषा ज़्यादा बोलती है। मिलन की चाह, दिल की तड़प और अनकहे जज़्बातों को बेहद खूबसूरती से पिरोती यह रचना पाठक के मन में एक मधुर रोमांटिक लहर जगा देती है।

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राब्ता : एक ग़ज़ल

राब्ता” एक ऐसे दिल की पुकार है, जो अपने ही रिश्ते में दूरी और उदासी महसूस करता है। शिकायत यह नहीं कि मोहब्बत कम है, बल्कि यह है कि समझने और अपनाने की कमी है। ख़्वाब सजाए गए हैं, मगर उन्हें पूरा करने वाली बाहों की गर्मी नहीं मिलती। रक़ीबों की जुर्रत चुभती है, लेकिन अपने परदे की हिफ़ाज़त करने वाला कहीं और खोया रहता है। आईने में भी अब चेहरा नहीं दिखता, क्योंकि नज़रें सिर्फ़ उसी हुस्न की तलाश में हैं। चाँद भी जब उसके दर पर आता है तो उसकी तवाज़ुन खो जाती है। मोहब्बत की क़वायदें शायद काफ़िरों जैसी नहीं होतीं, तभी तो दिल देने के बाद भी सुकून कहीं और नहीं मिलता।

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