
विजया डालमिया, हैदराबाद
उसने कहा-
“इधर से गुजरेंगे कभी…”
तब से हम
इंतज़ार के फूल बिछाए बैठे हैं।
उसने कहा-
“कहाँ से लाते हो इतनी महकती बातें?”
हमने कहा
“तेरी चाहत का इत्र लगाए बैठे हैं।”
उसने कहा-
“आँखों में इतनी मस्ती कहाँ से आती है?”
हमने कहा
“तुम्हारी आँखों से मिलकर
ये बहक जाती हैं।”
उसने कहा-
“इन मदभरी आँखों का जवाब नहीं।”
हमने कहा-
“ये सिर्फ तुम्हें देखती हैं,
इनमें कोई और ख़्वाब नहीं।”
