उसने कहा…

सांझ के समय फूलों से सजे रास्ते पर अपने प्रिय का इंतजार करता एक प्रेमी, जिसकी आँखों में प्रेम और उम्मीद झलक रही है।

विजया डालमिया, हैदराबाद

उसने कहा-
“इधर से गुजरेंगे कभी…”
तब से हम
इंतज़ार के फूल बिछाए बैठे हैं।

उसने कहा-
“कहाँ से लाते हो इतनी महकती बातें?”
हमने कहा
“तेरी चाहत का इत्र लगाए बैठे हैं।”

उसने कहा-
“आँखों में इतनी मस्ती कहाँ से आती है?”
हमने कहा
“तुम्हारी आँखों से मिलकर
ये बहक जाती हैं।”

उसने कहा-
“इन मदभरी आँखों का जवाब नहीं।”
हमने कहा-
“ये सिर्फ तुम्हें देखती हैं,
इनमें कोई और ख़्वाब नहीं।”
इन रचनाओं को अवश्य पढ़ें-

पुनर्मिलन
उसने कहा…
मैं लिखूँ
स्त्री : एक मुलाकात
नीली जुबान….!
गुलमोहर और रजनीगंधा
अधूरी बातें…
पराया मायका

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